दुर्ग जिले में कोटवारी भूमि बेचने वाले कोटवारों पर प्रशासन ने सख्त कार्रवाई शुरू की है। कलेक्टर अभिजीत सिंह के निर्देश पर इन जमीनों की बिक्री निरस्त कराने के लिए 73 सिविल वाद दायर किए गए हैं।
रायपुर, भारत 27 अग॰ 2026 ALN: दुर्ग जिले में कोटवारी भूमि बेचने वाले कोटवारों पर प्रशासन ने सख्त कार्रवाई शुरू की है। कलेक्टर अभिजीत सिंह के निर्देश पर इन जमीनों की बिक्री निरस्त कराने और संबंधित कोटवारों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है। यह भूमि ग्राम सेवक के रूप में सेवा की जाती है, जिसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदायों को उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भूमि उपलब्ध कराना है। कोटवारी भूमि का अवैध विक्रय न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह ग्रामीणों के अधिकारों का भी हनन करता है।
प्रारंभिक जांच में जिले की छह तहसीलों के 51 गांवों में कोटवारी भूमि का अवैध विक्रय पाया गया है। कुल 107 खसरों की लगभग 115.71 एकड़ (46.827 हेक्टेयर) भूमि बिक्री की जद में आई है। इन जमीनों की बिक्री को नियम विरुद्ध मानते हुए प्रशासन ने रजिस्ट्री शून्य कराने के लिए 73 सिविल वाद दायर किए हैं। यह कदम प्रशासन की ओर से एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य भूमि के अवैध लेन-देन को रोकना और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है।
जांच के दौरान दुर्ग तहसील के 16 गांवों में 13.997 हेक्टेयर, धमधा के 5 गांवों में 5.760 हेक्टेयर, पाटन के 17 गांवों में 10.73 हेक्टेयर, भिलाई-3 के 3 गांवों में 5.610 हेक्टेयर, बोरी के एक गांव में 0.280 हेक्टेयर और अहिवारा के 9 गांवों में 10.450 हेक्टेयर कोटवारी भूमि के विक्रय के मामले सामने आए हैं। यह आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि अवैध भूमि बिक्री की समस्या कितनी गंभीर है और इसे तत्काल समाधान की आवश्यकता है।
जमीन बेचने वाले 29 कोटवार अभी भी अपने पद पर हैं। इनके खिलाफ संबंधित राजस्व न्यायालयों में अनुशासनात्मक मामले दर्ज किए गए हैं। सभी को कारण बताओ नोटिस जारी कर सुनवाई शुरू कर दी गई है। सुनवाई पूरी होने के बाद नियम के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। यह प्रशासन की एक महत्वपूर्ण कार्रवाई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी प्रकार के अवैध कार्यों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
प्रशासन ने भविष्य में ऐसी भूमि की अवैध बिक्री रोकने के लिए भी कदम उठाए हैं। वर्तमान में कोटवारों को आवंटित सभी सेवा भूमि के खसरा नंबरों को पंजीयन विभाग के सॉफ्टवेयर में ब्लॉक कर दिया गया है। इसका उद्देश्य भविष्य में ऐसी भूमि की रजिस्ट्री को रोकना है। यह तकनीकी उपाय न केवल अवैध बिक्री को रोकने में मदद करेगा, बल्कि यह भूमि के सही उपयोग को सुनिश्चित करने में भी सहायक होगा।
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 183 में ग्राम सेवक की सेवा भूमि के संबंध में स्पष्ट प्रावधान है। इसके तहत सेवा भूमि में अपने हित को विक्रय, दान, बंधक या अन्य तरीके से निर्धारित अवधि से परे हस्तांतरित करने का प्रयास किया जाता है तो ऐसा संव्यवहार शून्य माना जाता है। यह कानून इस बात को सुनिश्चित करता है कि ग्राम सेवक अपनी सेवा भूमि का गलत उपयोग न करें और यह भूमि वास्तव में स्थानीय समुदाय की सेवा में रहे।
राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के निर्देशों के बाद कलेक्टर अभिजीत सिंह ने इन मामलों की लगातार समीक्षा की। उन्होंने संबंधित तहसीलदारों को बिक्री निरस्त कराने के लिए सिविल वाद दायर करने और भूमि बेचने वाले कोटवारों के खिलाफ नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। प्रशासन अब लंबित मामलों में सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगा। इस प्रकार की कार्रवाई न केवल कानून के प्रति प्रशासन की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, बल्कि यह स्थानीय लोगों के प्रति उसकी जिम्मेदारी को भी उजागर करती है।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि दुर्ग जिले में कोटवारी भूमि की बिक्री के खिलाफ प्रशासन की यह कार्रवाई एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल अवैध भूमि बिक्री की समस्या को समाप्त करने में मदद मिलेगी, बल्कि यह स्थानीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी। इस प्रकार की कार्रवाई भविष्य में अन्य जिलों में भी उदाहरण के रूप में काम कर सकती है, जिससे पूरे राज्य में भूमि के अवैध लेन-देन को रोकने के लिए एक मजबूत आधार तैयार होगा।
इसके अलावा, इस मामले में प्रशासन की सक्रियता से यह भी संकेत मिलता है कि सरकारी निकाय अब भूमि के सही उपयोग और संरक्षण के प्रति अधिक सजग हैं। यह न केवल स्थानीय लोगों के लिए लाभकारी है, बल्कि यह राज्य के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भूमि के अवैध विक्रय की समस्या भारत के कई हिस्सों में एक गंभीर चिंता का विषय रही है। यह समस्या विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है, जहां भूमि का उपयोग और अधिकार अक्सर अस्पष्ट होते हैं। कोटवारी भूमि, जो ग्राम सेवकों द्वारा स्थानीय समुदायों के लिए आवंटित की जाती है, का अवैध विक्रय न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह स्थानीय लोगों के लिए भी गंभीर आर्थिक परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
इस संदर्भ में, प्रशासन द्वारा उठाए गए कदम न केवल एक तात्कालिक उपाय हैं, बल्कि यह दीर्घकालिक स्थिरता और विकास के लिए भी आवश्यक हैं। जब भूमि का सही उपयोग सुनिश्चित होता है, तो यह स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने में मदद करता है और उनकी आर्थिक स्थिति को भी सुधारता है। इसके अलावा, यह कदम सरकारी नीतियों के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाने में भी सहायक होगा।
अंततः, दुर्ग जिले में कोटवारी भूमि के अवैध विक्रय के खिलाफ प्रशासन की यह कार्रवाई एक सकारात्मक संकेत है कि सरकार अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए गंभीर है। यह न केवल वर्तमान में अवैध लेन-देन को रोकने में मदद करेगा, बल्कि भविष्य में भी एक मजबूत कानूनी ढांचे का निर्माण करेगा, जिससे सभी के लिए न्याय और समानता सुनिश्चित की जा सके।
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