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रूसी तेल खरीद पर 500 फीसदी टैरिफ: US सांसदों ने भारत का नाम लिया

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 15, 2026, 06:19 AM IST
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अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए नए विधेयक में रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान है, जिसमें भारत का भी नाम शामिल है।

अमेरिकी सीनेट में हाल ही में पेश किए गए एक नए विधेयक में रूस पर व्यापक प्रतिबंधों की योजना बनाई गई है। इस प्रस्ताव में विशेष रूप से उन देशों पर शुल्क लगाने का प्रावधान है जो रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखते हैं। इसमें भारत का नाम भी शामिल किया गया है। यह विधेयक रूस के ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा क्षेत्रों पर कड़े प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव करता है, जिसका उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है। हालांकि, प्रस्तावित शुल्क की वास्तविक दर अभी तय नहीं की गई है और इसे बाद में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि द्वारा निर्धारित किया जाएगा।

इस विधेयक के मुख्य प्रायोजक, डेमोक्रेटिक सीनेटर ब्लूमेंथल ने स्पष्ट किया है कि यह केवल शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, विशेषकर ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र, रक्षा उद्योग, रूसी उद्योगपतियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का भी प्रावधान किया गया है। यह विधेयक सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के तुरंत बाद पेश किया गया है, जिन्होंने इस पर लगभग दो वर्षों तक काम किया था। उनके सहयोगियों का मानना है कि ग्राहम इस विधेयक के प्रमुख सूत्रधार थे।

ब्लूमेंथल ने जिन पांच देशों का नाम लिया है, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। विधेयक में यह भी उल्लेख किया गया है कि जो देश अपनी कुल गैस का 15 प्रतिशत से कम रूस से आयात करते हैं और इन आयातों को कम करने के लिए कदम उठा रहे हैं, उन्हें इस प्रस्तावित शुल्क से छूट मिलेगी। यह एक महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि यह उन देशों को प्रोत्साहित करेगा जो रूस पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

सीनेटरों ने स्पष्ट किया है कि शुल्क की दर अभी तय नहीं की गई है। यह अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि द्वारा निर्धारित की जाएगी, और ब्लूमेंथल ने उम्मीद जताई है कि यह दर इतनी होगी कि "चीन, भारत और रूस से तेल तथा गैस खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को इससे हतोत्साहित किया जा सके।" हालांकि, उन्होंने कोई निश्चित प्रतिशत बताने से इनकार कर दिया, जो इस विधेयक के भविष्य पर अनिश्चितता को दर्शाता है।

इसके अतिरिक्त, विधेयक में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। यदि बाद में शुल्क कम किया जाता है, तो इसकी जानकारी कांग्रेस को देना अनिवार्य होगा। यह प्रावधान राष्ट्रपति को अधिक लचीलापन प्रदान करता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय स्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें। सीनेटर जेम्स रिश, जो सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष हैं, ने इस विधेयक में एक अलग प्रावधान जोड़ने पर जोर दिया है, जिसके तहत रूस के तथाकथित "शैडो फ्लीट" यानी उन तेल टैंकरों पर कार्रवाई की जाएगी, जिनका उपयोग मौजूदा प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है।

सांसदों ने यह भी कहा है कि इस विधेयक को पहले के मसौदे की तुलना में काफी सीमित किया गया है। पहले के संस्करण में कथित तौर पर 63 देशों पर शुल्क लगाने का प्रावधान था, जबकि वर्तमान मसौदा केवल रूस से तेल खरीदने वाले पांच और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों पर केंद्रित है। यह बदलाव ट्रंप प्रशासन के सुझाव पर किया गया है, जिसने इस विधेयक का समर्थन भी किया है।

सीनेटर टेड क्रूज ने इस बात पर जोर दिया कि ग्राहम ने अपने निधन से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस विधेयक की शर्तों पर सीधे बातचीत की थी। उन्होंने सांसदों से अपील की कि इसे भारी बहुमत से पारित कर ग्राहम को श्रद्धांजलि दी जाए। सांसदों ने कहा है कि इस विधेयक को जल्द पारित करना आवश्यक है, और उन्होंने यूक्रेन में युद्धक्षेत्र में बढ़ती स्थिति और रूस द्वारा नागरिक इलाकों पर जारी हमलों का हवाला दिया।

कई सीनेटरों ने उम्मीद जताई है कि अगस्त के अंत तक सीनेट इस पर कार्रवाई कर सकती है। उनका कहना है कि यदि पर्याप्त समर्थन मिलता है, तो इस पर मतदान कराया जाएगा। जब राष्ट्रपति ट्रंप के उस सुझाव के बारे में पूछा गया कि इस विधेयक में ईरान या हिजबुल्ला पर प्रतिबंधों को भी शामिल किया जा सकता है, तो ब्लूमेंथल ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता मौजूदा विधेयक को आगे बढ़ाने की है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में अलग विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया।

भारत ने अब तक रियायती दर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए पश्चिमी देशों के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। 2022 के बाद से, भारत का रूस से तेल आयात काफी बढ़ा है, और यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला को ध्यान में रखते हुए, यह स्थिति जटिल हो गई है। भारत ने अपने ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन रूस से सस्ते तेल की खरीद ने उसे एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान किया है।

इस विधेयक के पारित होने से भारत की ऊर्जा नीति पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि भारत को इस प्रस्तावित शुल्क का सामना करना पड़ता है, तो उसे अपने ऊर्जा आयात के स्रोतों में बदलाव करने पर विचार करना पड़ सकता है। यह स्थिति भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए एक चुनौती बन सकती है।

इसके साथ ही, यह विधेयक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ ला सकता है। यदि भारत, चीन और अन्य देशों पर इस तरह के शुल्क लगाए जाते हैं, तो यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता पैदा कर सकता है। इसके अलावा, इससे भारत और अमेरिका के बीच संबंधों पर भी प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि भारत ने हमेशा अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है।

इस विधेयक के संभावित प्रभावों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि अमेरिका और रूस के बीच चल रही भू-राजनीतिक टकराव का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव एशिया और विशेष रूप से भारत पर भी पड़ सकता है। इस प्रकार, यह विधेयक न केवल अमेरिका की ऊर्जा नीति को प्रभावित करेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन पर भी गहरा असर डालेगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी है, जिससे कई देशों को ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है। भारत के लिए, जो ऊर्जा का एक बड़ा आयातक है, यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बन गई है। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार करना होगा, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विकास, अन्य देशों से तेल और गैस का आयात, और घरेलू ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि शामिल हैं।

भारत ने अपनी ऊर्जा नीति में विविधता लाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिसमें सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों का विकास शामिल है। हालाँकि, रूस से सस्ते तेल की खरीद ने भारत को एक महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ प्रदान किया है, जो उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। ऐसे में, यदि अमेरिका द्वारा प्रस्तावित शुल्क लागू होता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा नीति में समायोजन करना पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, यह विधेयक अन्य देशों के लिए भी एक उदाहरण स्थापित कर सकता है कि कैसे भू-राजनीतिक मुद्दों के कारण ऊर्जा खरीद पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।

इस विधेयक का पारित होना और इसके संभावित प्रभाव न केवल अमेरिका और रूस के बीच संबंधों को प्रभावित करेगा, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर ऊर्जा नीति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, और भू-राजनीतिक संतुलन में भी महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। भारत जैसे देशों को इस स्थिति में अपने हितों की रक्षा करने के लिए सावधानीपूर्वक रणनीतियाँ अपनानी होंगी, ताकि वे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति को मजबूत कर सकें।

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