चीन की यारलुंग त्सांगपो नदी पर बन रही जलविद्युत परियोजना के नीचे सक्रिय फॉल्ट लाइन के कारण भूकंप और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।
लखनऊ, भारत 12 जुल॰ 2026 ALN: चीन के वैज्ञानिकों ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बन रही विशाल जलविद्युत परियोजना से जुड़े भू-वैज्ञानिक जोखिमों को लेकर नई चिंता जताई है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि परियोजना स्थल के नीचे मौजूद एक सक्रिय फॉल्ट लाइन दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध की संरचनात्मक स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकती है।
चीनी वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में तिब्बत की यारलुंग त्सांगपो नदी पर बन रही विशाल जलविद्युत परियोजना के नीचे सक्रिय पाइजेन फॉल्ट लाइन होने की चेतावनी दी गई है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इससे भूकंप, भूस्खलन और ढलानों की अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है तथा परियोजना में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाने की जरूरत है।
यह चेतावनी पिछले महीने चीनी भाषा की पत्रिका 'सेडिमेंटरी जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' में प्रकाशित एक अध्ययन पर आधारित है। यह शोध सरकारी संस्था चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के पर्यवेक्षण में किया गया था। अध्ययन में पाया गया कि पाइजेन फॉल्ट, जो पूर्वी हिमालय क्षेत्र में पृथ्वी की ऊपरी सतह में मौजूद एक सक्रिय दरार है, सीधे उस क्षेत्र के नीचे से गुजरती है जहां तिब्बत के मेतोग काउंटी में मेतोग जलविद्युत स्टेशन का निर्माण किया जा रहा है।
हालांकि शोधकर्ताओं ने परियोजना को बंद करने की मांग नहीं की, लेकिन उन्होंने इंजीनियरों को अधिक मजबूत सुरक्षा उपाय अपनाने की सलाह दी है। इनमें ढलानों की स्थिरता में सुधार, रिटेनिंग संरचनाओं की स्थापना और भूस्खलन, भू-धंसाव तथा अन्य भू-वैज्ञानिक खतरों को कम करने के उपाय शामिल हैं।
वैज्ञानिकों ने कहा कि इस फॉल्ट के कारण आसपास की चट्टानों में दरारें आई हैं और उनके भौतिक गुणों में बदलाव हुआ है, जिससे क्षेत्र में बनने वाली इंजीनियरिंग परियोजनाओं की नींव और स्थिरता अधिक संवेदनशील हो सकती है। अध्ययन में यह भी बताया गया कि पाइजेन क्षेत्र यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना के जलाशय क्षेत्र के भीतर आता है। जलाशय के आसपास की भूमि की संरचना ढीली और आपसी पकड़ कमजोर होने के कारण लंबे समय तक पानी के संपर्क, भूकंप या फॉल्ट गतिविधि के दौरान ढलानों के अस्थिर होने का खतरा बढ़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र दुनिया के सबसे सक्रिय क्षेत्रों में से एक है, जहां अक्सर शक्तिशाली भूकंप आते हैं। इस क्षेत्र में भूकंप की घटनाओं का इतिहास भी बहुत पुराना है। पिछले कुछ दशकों में कई बड़े भूकंप आए हैं, जिनमें से कुछ ने व्यापक तबाही मचाई है। इस प्रकार, यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना के निर्माण में इन भू-वैज्ञानिक कारकों को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक है।
फॉल्ट लाइन असल में होती क्या है?
पृथ्वी की ऊपरी परत बड़ी-बड़ी टेक्टोनिक प्लेटों में बंटी हुई है। जब ये प्लेटें आपस में टकराती हैं, एक-दूसरे से दूर जाती हैं, या आपस में रगड़ खाती हैं, तो जमीन में दरारें पड़ जाती हैं। इन्हीं दरारों को फॉल्ट या भ्रंश कहा जाता है।
इस अध्ययन को चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन सेंटर और मिडिल यारलुंग जांगबो रिवर नेचुरल रिसोर्सेज ऑब्जर्वेशन एंड रिसर्च स्टेशन के भूवैज्ञानिकों द्वारा किया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, पाइजेन फॉल्ट हिमयुग के बाद से काफी सक्रिय रही है और यह आसपास के बुनियादी ढांचे जैसे बांध, सड़कें, पुल, सुरंगें और जलाशय क्षेत्र की संरचनात्मक मजबूती को प्रभावित कर सकती है।
यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना, जिसे चीन की सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा और विकास की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण परियोजना माना है, का उद्देश्य न केवल देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना है, बल्कि यह क्षेत्र की आर्थिक विकास में भी योगदान देने की उम्मीद है। हालांकि, इस परियोजना के भू-वैज्ञानिक जोखिमों को नजरअंदाज करना दीर्घकालिक स्थिरता और सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकता है।
चीन में जलविद्युत परियोजनाओं का विकास तेजी से हो रहा है। सरकार ने हरित ऊर्जा के स्रोतों को प्राथमिकता देने के लिए कई बड़े बांधों का निर्माण किया है। लेकिन, इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय और भू-वैज्ञानिक प्रभावों पर ध्यान देना भी आवश्यक है। वैज्ञानिकों का यह अध्ययन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो जलविद्युत विकास के साथ जुड़े जोखिमों को उजागर करता है।
यदि इन भू-वैज्ञानिक चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना न केवल चीन के लिए, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के लिए भी एक संभावित खतरा बन सकती है। इसके अलावा, यदि परियोजना में कोई गंभीर विफलता होती है, तो इसका प्रभाव न केवल स्थानीय निवासियों पर पड़ेगा, बल्कि यह क्षेत्र की जलवायु, पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल सकता है।
इसलिए, शोधकर्ताओं ने सिफारिश की है कि परियोजना के विकास में भू-वैज्ञानिक अध्ययन और सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह न केवल परियोजना की सफलता के लिए आवश्यक है, बल्कि यह स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
भविष्य में, यदि चीन अपनी जलविद्युत परियोजनाओं को जारी रखना चाहता है, तो उसे इस तरह के भू-वैज्ञानिक कारकों को ध्यान में रखते हुए अधिक सतर्कता बरतनी होगी। इस दिशा में ठोस कदम उठाने से न केवल परियोजनाओं की स्थिरता में सुधार होगा, बल्कि यह प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को भी कम करेगा, जिससे स्थानीय निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।
चीन में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय दबावों के साथ, जलविद्युत परियोजनाओं का विकास एक जटिल चुनौती बन गया है। यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े पैमाने पर विकास कार्यों के साथ, यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक, इंजीनियर और नीति निर्माता मिलकर काम करें ताकि इन परियोजनाओं के दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन किया जा सके।
साथ ही, स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। उन्हें परियोजना के विकास में शामिल करने से न केवल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि यह विकास के सामाजिक और आर्थिक लाभों को भी बढ़ा सकता है। स्थानीय लोगों के अनुभव और ज्ञान का उपयोग करके, परियोजना को और अधिक स्थायी और प्रभावी बनाया जा सकता है।
अंत में, यारलुंग त्सांगपो जलविद्युत परियोजना का मामला एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाएं न केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए आवश्यक हैं, बल्कि उन्हें सुरक्षित और स्थायी तरीके से विकसित करने की आवश्यकता है। यह न केवल चीन के लिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर जलविद्युत विकास के लिए एक चेतावनी है कि भू-वैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारकों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
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