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भारतीय वैज्ञानिकों ने दिमाग का सबसे विस्तृत 3डी एटलस तैयार किया

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 14, 2026, 04:07 PM IST
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भारत का नया ब्रेनस्टेम एटलस वैज्ञानिकों को दिमाग के सबसे कम समझे जाने वाले हिस्सों का अब तक का सबसे विस्तृत 'नक्शा' मुहैया करवाता है.

एक सदी से भी ज़्यादा समय से वैज्ञानिक इंसानी दिमाग को समझने की कोशिश कर रहे हैं. वे उसी तरह काम करते रहे हैं, जैसे पुराने समय के नक्शानवीस अनजान इलाकों का नक्शा बनाते थे.

ये वैज्ञानिक अलग-अलग जगहों से मिली छोटी-छोटी जानकारियों को जोड़कर पूरी तस्वीर को समझने की कोशिश करते हैं.

इंसानी दिमाग में लगभग 86 अरब तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन) होती हैं. ऐसे में दिमाग का बड़ा हिस्सा अब भी पूरी तरह समझ से बाहर है.

इसी कमी को दूर करने के लिए आईआईटी मद्रास के सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर (एसजीबीसी) के वैज्ञानिकों ने एक बड़ा कदम उठाया है.

उनका मानना है कि उनकी नई खोज दिमाग से जुड़े शोध की एक बड़ी कमी को पूरा करने में मदद करेगी.

वैज्ञानिकों ने इंसानी ब्रेनस्टेम का दुनिया का सबसे विस्तृत 3डी डिजिटल एटलस तैयार किया है. इसमें कोशिका स्तर तक की जानकारी शामिल है.

इस डिजिटल नक्शे की मदद से वैज्ञानिक पूरे दिमाग के एमआरआई स्कैन से लेकर एक-एक तंत्रिका कोशिका तक आसानी से पहुंच सकते हैं और उसका अध्ययन कर सकते हैं.

इस डिजिटल एटलस का नाम 'एंकर' रखा गया है. इसे भ्रूण, बच्चों और वयस्कों के दिमाग के 500 से अधिक टिश्यू नमूनों को जोड़कर तैयार किया गया है.

यह एटलस महंगी मॉलिक्यूलर तकनीक की बजाय हाई-रिज़ॉल्यूशन माइक्रोस्कोप तस्वीरों के आधार पर बनाया गया है. इससे ब्रेनस्टेम का बेहद विस्तृत 3डी नक्शा तैयार हुआ है. इसमें दिमाग की 200 से अधिक ब्रेन सेल्स और तंत्रिका मार्गों की पहचान की गई है.

इस एटलस में केमिकल मार्कर्स का इस्तेमाल किया गया है. इनकी मदद से अलग-अलग तरह की कोशिकाओं की पहचान की जा सकती है. इससे दिमाग के इस बेहद महत्वपूर्ण, लेकिन अब तक कम समझे गए हिस्से की सबसे साफ तस्वीर सामने आई है.

ब्रेनस्टेम दिमाग का बहुत छोटा हिस्सा होता है, लेकिन यही शरीर को जीवित रखने में सबसे अहम भूमिका निभाता है. यह दिमाग को रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइनल कॉर्ड से जोड़ता है.

सांस लेना, दिल की धड़कन, नींद, जागना और शरीर की हरकतें जैसे कई ज़रूरी काम इसी के नियंत्रण में होते हैं.

ब्रेनस्टेम की छोटी-सी कोशिका समूहों को भी नुकसान पहुंचने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन इसकी बनावट इतनी जटिल है कि इसका पूरा नक्शा बनाना अब तक मुश्किल रहा है.

'एंकर' की खासियत सिर्फ एक नया नक्शा तैयार करना नहीं है. यह दिमाग की जांच के दो अलग-अलग तरीकों को पहली बार जोड़ने का काम करता है.

एक तरफ मेडिकल इमेजिंग है, जो पूरे दिमाग की तस्वीर दिखाती है, तो वहीं दूसरी तरफ कोशिका स्तर की जांच है, जो एक-एक कोशिका की जानकारी देती है.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की न्यूरोसाइंटिस्ट शुभा टोले कहती हैं कि यह भारत के लिए एक दूरदर्शी पहल है.

उन्होंने इस प्रोजेक्ट को इंजीनियरिंग, न्यूरोसाइंस और चिकित्सा का अनोखा संगम बताया है.

आमतौर पर डॉक्टर पोस्टमार्टम या न्यूरोसर्जरी के दौरान निकाले गए दिमाग की पहले पूरी तरह जांच करते हैं.

एक वयस्क का दिमाग करीब 1.2 से 1.5 किलोग्राम का होता है. उसकी बनावट और अलग-अलग हिस्सों को देखकर कई अहम सुराग मिल जाते हैं. इसके बाद माइक्रोस्कोप से बारीकी से जांच की जाती है.

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से जुड़ी न्यूरोपैथोलॉजिस्ट रेबेका फोल्कर्थ कहती हैं कि वह सबसे पहले पूरे दिमाग को बिना किसी उपकरण के देखती हैं.

इसके बाद वे दिमाग के छोटे-छोटे हिस्सों की माइक्रोस्कोप से जांच करती हैं. उन्होंने इस प्रोजेक्ट में आईआईटी मद्रास की टीम के साथ भी काम किया है.

रेबेका फोल्कर्थ कहती हैं, "अल्ज़ाइमर जैसी बीमारी की जांच में आमतौर पर दिमाग के सिर्फ 15 से 20 छोटे हिस्सों का अध्ययन किया जाता है. यह पूरे दिमाग का बहुत ही छोटा हिस्सा होता है."

वैज्ञानिक पिछले करीब 100 साल से इसी तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह तरीका स्पेन के प्रसिद्ध न्यूरोसाइंटिस्ट सैंटियागो रामोन वाई काजाल के समय से चला आ रहा है.

आधुनिक एमआरआई पूरे दिमाग की तस्वीर तो दिखाता है, लेकिन कोशिकाओं की बारीक जानकारी नहीं देती. वहीं माइक्रोस्कोप से एक-एक कोशिका दिखाई देती है, लेकिन ऐसा करने के लिए बहुत छोटे छोटे हिस्सों को अलग-अलग देखना पड़ता है.

रेबेका फोल्कर्थ ने बीबीसी से कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने वही काम किया है, जिसका सपना उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में देखा था.

रेबेका पिछले 30 सालों में हजारों दिमागों का अध्ययन कर चुकी हैं.

वे कहती हैं कि उनकी इच्छा थी कि दिमाग के स्कैन और उसकी सूक्ष्म बनावट को एक साथ देखा जा सके.

'एंकर' इसी कमी को दूर करने की कोशिश करता है.

इस डिजिटल एटलस की मदद से वैज्ञानिक पूरे ब्रेनस्टेम की तस्वीर से सीधे एक-एक न्यूरॉन तक पहुंच सकते हैं. इस दौरान हर कोशिका अपनी सही जगह पर दिखाई देती है. शोधकर्ताओं ने इस एटलस को सभी के लिए ऑनलाइन उपलब्ध कराया है.

उन्हें उम्मीद है कि यह एटलस दुनिया भर के न्यूरोसाइंटिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरोसर्जन की मदद कर पाएगी और वे इसका इस्तेमाल रेफरेंस टूल की तरह कर सकेंगे.

इस एटलस का उपयोग केवल दिमाग की बनावट समझने तक सीमित नहीं रहेगा. यह कई अन्य तरह के शोध और इलाज में भी मदद कर सकता है.

स्वस्थ और बीमार ब्रेनस्टेम की तुलना करके वैज्ञानिक कई गंभीर बीमारियों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे.

इनमें पार्किंसन, स्ट्रोक, अल्ज़ाइमर और नवजात शिशुओं की अचानक होने वाली मौत जैसी स्थितियां शामिल हैं.

यह विस्तृत नक्शा न्यूरोसर्जनों को दिमाग के सबसे संवेदनशील हिस्सों में ऑपरेशन करने में भी अधिक सटीकता और भरोसा देगा.

'एंकर' कोई बीमारी पहचानने वाला टूल नहीं है. इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह वैज्ञानिकों को दिमाग से जुड़े कई नए सवालों के जवाब खोजने में मदद कर सकता है.

कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लैबोरेटरी के ब्रेन साइंटिस्ट पार्थ मित्रा का कहना है कि ऐसे विस्तृत ब्रेन एटलस दिमाग से जुड़ी बीमारियों के शोध में बड़ा बदलाव ला सकते हैं.

उन्होंने आईआईटी मद्रास की टीम के साथ भी काम किया है. उनका कहना है कि इस एटलस की मदद से वैज्ञानिक एक-एक कोशिका के स्तर पर देख सकेंगे कि अल्ज़ाइमर, ऑटिज्म और दूसरी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से प्रभावित दिमाग स्वस्थ दिमाग से किस तरह अलग होता है.

इससे भविष्य में इन बीमारियों को समझने और उनके बेहतर इलाज का रास्ता खुल सकता है.

मित्रा ने बीबीसी से कहा कि यह एटलस यह समझने में भी मदद कर सकता है कि कोविड-19 जैसी बीमारियां दिमाग को लंबे समय तक कैसे प्रभावित करती हैं.

इससे वैज्ञानिक यह जान सकेंगे कि संक्रमण के बाद तंत्रिका तंत्र को किस तरह का नुकसान होता है. यह जानकारी भविष्य में बेहतर इलाज विकसित करने में भी मदद कर सकती है.

फोल्कर्थ का कहना है कि स्ट्रोक के मामले में इस एटलस से कुछ नई जानकारियां मिली हैं. इनकी मदद से डॉक्टर दिमाग के उन हिस्सों को बचाने की कोशिश कर सकते हैं जो घायल तो हैं, लेकिन पूरी तरह खराब नहीं हुए हैं.

इससे मरीजों के ठीक होने की संभावना बढ़ सकती है. दूसरे वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एटलस न्यूरोसर्जनों को ब्रेनस्टेम की सर्जरी अधिक सुरक्षित तरीके से करने में भी मदद करेगा.

इस एटलस की एक बड़ी खासियत इसकी सरल तकनीक है. इसे मौत के बाद लिए गए दिमाग के पतले टिश्यू नमूनों की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरों से तैयार किया गया है. इस तरीके से कोशिका स्तर की विस्तृत मैपिंग कम लागत में संभव हो गई है.

मित्रा का कहना है कि इसी वजह से पहली बार मानव ब्रेनस्टेम का इतना विस्तृत नक्शा तैयार किया जा सका है. इतनी बारीकी से पहले कभी इस हिस्से का अध्ययन संभव नहीं था.

यह उपलब्धि न्यूरोसाइंस के बदलते स्वरूप को भी दिखाती है. अब इस क्षेत्र में केवल जीवविज्ञान ही नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग और कंप्यूटर तकनीक की भी बड़ी भूमिका है. इनके मेल से नई खोजें तेजी से संभव हो रही हैं.

एसजीबीसी में करीब 20 वैज्ञानिकों ने 18 महीनों तक मेहनत करके दिमाग के 200 से ज्यादा हिस्सों का विश्लेषण किया.

उन्होंने एमआरआई स्कैन, माइक्रोस्कोप से मिली जानकारी और 3डी तकनीक को जोड़कर यह डिजिटल एटलस तैयार किया.

आज इस केंद्र में 200 से अधिक वैज्ञानिक, इंजीनियर और तकनीशियन काम कर रहे हैं. वे दुनिया भर के विशेषज्ञों के साथ मिलकर शोध कर रहे हैं.

यह एटलस न्यूरोसाइंस की एक बड़ी कमी को दूर करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. इससे वैज्ञानिकों को मानव मस्तिष्क को पहले से कहीं बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी.

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