पुरी के गजपति महाराज ने राष्ट्रपति और पीएम को पत्र लिखकर ISKCON द्वारा विदेशों में अलग समय पर रथयात्रा आयोजित करने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने परंपरा की रक्षा की मांग की है।
नई दिल्ली, भारत 10 जुल॰ 2026 ALN: पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने ISKCON द्वारा विदेशों में अलग समय पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित करने के खिलाफ अपनी चिंता व्यक्त की है। यह पत्र 8 जुलाई को लिखा गया था और इसमें महाराज ने पुरी की प्राचीन परंपरा की रक्षा के लिए उचित कदम उठाने की मांग की है।
दिव्यसिंह देव, जो श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति (SJTMC) के अध्यक्ष भी हैं, ने अपने पत्र में कहा है कि ISKCON का रथ यात्रा का आयोजन ऐसी तारीखों पर हो रहा है, जो शास्त्रों के अनुसार नहीं हैं। उनका यह भी कहना है कि इस तरह की गतिविधियों से भक्तों की भावनाएं आहत हो रही हैं।
ISKCON, जो अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण जागृति आंदोलन के लिए जाना जाता है, का कहना है कि भगवान जगन्नाथ सभी श्रद्धालुओं के हैं, चाहे वे किसी भी देश में क्यों न हों। संगठन का तर्क है कि विदेशों में मौसम, स्थानीय परिस्थितियों और भक्तों की सुविधा को देखते हुए रथयात्रा की तारीख में लचीलापन रखा जाता है। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को उत्सव में शामिल करने और जगन्नाथ संस्कृति का वैश्विक प्रसार करना है।
इस साल, ISKCON ने लंदन में 21 जून, न्यूयॉर्क सिटी में 14 जून, और सिडनी में 5 जुलाई को रथयात्रा का आयोजन किया। जबकि पुरी में स्नान पूर्णिमा 29 जून को थी और मुख्य रथयात्रा 16 जुलाई को होगी। इस प्रकार, ISKCON की रथयात्राएं पुरी की तिथियों से भिन्न हैं, जो गजपति महाराज के लिए चिंता का विषय है।
गजपति महाराज ने उज्जैन स्थित ISKCON मंदिर द्वारा मध्य प्रदेश के 66 स्थानों पर 16 से 25 जुलाई के बीच रथयात्रा आयोजित करने की योजना पर भी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, रथ यात्रा केवल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होने वाला 9 दिवसीय उत्सव है।
उन्होंने यह भी कहा कि महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित स्कंद पुराण में भगवान जगन्नाथ ने स्वयं स्नान यात्रा और रथयात्रा की निर्धारित तिथि बताई हैं। ऐसे में, मनमानी तिथियों पर आयोजित करना प्राचीन परंपराओं और शास्त्रों के विपरीत है।
ISKCON ने पुरी मंदिर की पिछली आपत्तियों का जवाब देते हुए कहा था कि हर देश में जलवायु परिस्थितियों, सरकारी नियमों और स्थानीय सांस्कृतिक कारकों का बड़ा असर पड़ता है। इसके कारण शास्त्रों में बताई गई तारीख पर रथयात्रा आयोजित करना हमेशा संभव नहीं होता है।
ISKCON ने पुरी मंदिर को बताया कि रूस में वहां का मौसम, सरकार और स्थानीय संस्कृति अक्सर शास्त्रों में बताई गई तारीखों पर रथयात्रा निकालने के अनुकूल नहीं होती है। इस प्रकार, ISKCON का तर्क है कि वे भक्तों की भलाई के लिए रथयात्रा की तारीखों में लचीलापन रखते हैं।
रथयात्रा को लेकर विवाद नया नहीं है। 2024 और 2025 में भी पुरी के गजपति महाराजा ने ISKCON से अनुरोध किया था कि विदेशों में भी पुरी के धार्मिक पंचांग के अनुसार रथयात्रा आयोजित की जाए। 2026 में यह विवाद इसलिए अधिक चर्चा में आया क्योंकि कई देशों में रथयात्रा पुरी की तिथि से कई हफ्ते पहले आयोजित की गई, जिसके बाद औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई गई।
रथयात्रा का आयोजन भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह उत्सव भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यात्रा का प्रतीक है। हर साल, भगवान जगन्नाथ के 45 फीट ऊंचे तीनों रथों को 200 से ज्यादा लोग सिर्फ 58 दिनों में तैयार करते हैं। ये रथ खास लकड़ियों से पूरी तरह हाथों से बनाए जाते हैं। रथों का निर्माण हर साल अक्षय तृतीया से शुरू होता है और गुंडिचा यात्रा के दो दिन पहले तक रथ तैयार हो जाते हैं। यात्रा खत्म होने के बाद रथों को तोड़ दिया जाता है, जो इस परंपरा का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस विवाद का एक और पहलू यह है कि यह भारतीय संस्कृति और उसकी विविधता के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण को उजागर करता है। जब एक धार्मिक परंपरा का वैश्वीकरण होता है, तो विभिन्न संस्कृतियों, जलवायु और स्थानीय परंपराओं के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती बन जाता है। ISKCON का तर्क यह दर्शाता है कि धार्मिक उत्सवों का आयोजन केवल धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नहीं, बल्कि स्थानीय संदर्भों के अनुसार भी होना चाहिए।
दूसरी ओर, गजपति महाराज का दृष्टिकोण इस बात पर जोर देता है कि धार्मिक परंपराओं को बनाए रखना और उनका सम्मान करना आवश्यक है। उनका मानना है कि धार्मिक ग्रंथों में जो निर्देश दिए गए हैं, उन्हें ध्यान में रखना चाहिए, ताकि भक्तों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।
इस प्रकार, यह विवाद केवल एक धार्मिक उत्सव के आयोजन की तारीखों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में धार्मिक परंपराओं, संस्कृति और वैश्वीकरण के बीच के संबंधों को भी उजागर करता है। यह दर्शाता है कि कैसे विभिन्न धार्मिक समूह अपने-अपने दृष्टिकोण से परंपराओं का पालन करते हैं और कैसे वे एक-दूसरे के विचारों का सम्मान कर सकते हैं।
इस संदर्भ में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा इस पत्र का क्या उत्तर दिया जाएगा और क्या वे इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाएंगे। यह न केवल पुरी की धार्मिक परंपराओं के लिए, बल्कि पूरे देश में धार्मिक सहिष्णुता और विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।
रथयात्रा का आयोजन भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है, जो न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। यह उत्सव भक्तों के लिए एक अवसर है, जहां वे भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त करने के लिए एकत्रित होते हैं।
इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह धार्मिक संस्थानों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने का एक अवसर भी हो सकता है। जब विभिन्न धार्मिक संगठनों के बीच मतभेद होते हैं, तो यह आवश्यक है कि वे एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझें और संवाद करें। इससे न केवल विवादों का समाधान हो सकता है, बल्कि एक व्यापक सहिष्णुता और समझ का माहौल भी बन सकता है।
अंत में, यह मुद्दा न केवल धार्मिक परंपराओं के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय समाज में विविधता, सहिष्णुता और आपसी सम्मान के मूल्यों को भी उजागर करता है। जब हम धार्मिक उत्सवों का आयोजन करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह सभी के लिए समावेशी हो और सभी की भावनाओं का सम्मान किया जाए।
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