अयोध्या राम मंदिर के निर्माण में भ्रष्टाचार और चढ़ावे की चोरी ने हिंदू समाज की आस्था को चुनौती दी है। अपूर्वानंद की टिप्पणी में इस मुद्दे पर गहराई से विचार किया गया है।
नई दिल्ली, भारत 13 जुल॰ 2026 ALN: बाबरी मस्जिद को तोड़कर उसकी ज़मीन पर न्यायिक छल और राजकीय बल के सहारे बनाए गए राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला राष्ट्रीय मसला बन गया है। इस एक मंदिर में हुए भ्रष्टाचार को संपूर्ण हिंदू समाज की आस्था के साथ धोखे के रूप में देखा जा रहा है। इस धोखे पर होनेवाले शोर शराबे में कोई यह नहीं कह रहा कि इस मंदिर का निर्माण ख़ुद धार्मिकता और आस्था के साथ खिलवाड़ था, कि इस मंदिर को कभी भी सत्य की मर्यादा के लिए नहीं याद किया जाएगा, कि इसके पीछे असत्य, अपराध और हिंसा का एक पूरा सिलसिला है, कि यह मंदिर हिंदुओं के दिल और दिमाग़ के साथ किए गए सबसे बड़े घपले का परिणाम और प्रतीक है। इस पर हम आगे बात करेंगे। अभी जो प्रसंग सामने है उस पर चर्चा कर लें।
कांग्रेस समेत सारे विपक्षी दल बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर बनाए गए राम मंदिर में हुए भ्रष्टाचार के लिए भारत के प्रधानमंत्री को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनके साथ भारतीय जनता पार्टी और उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जवाब तलब किया जा रहा है। दूसरी तरफ़ भाजपा, आर एस एस और उनका प्रचारक मीडिया इसे चढ़ावे के इंतज़ाम में लगे लोगों तक सीमित करना चाहते हैं। बात-बात में बोलनेवाले प्रधानमंत्री ख़ामोश हैं।
हिंदुत्ववादी गिरोहों में प्रतिद्वंद्वी एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं और एक दूसरे की पोल खोल रहे हैं। वे कह रहे हैं कि मामला मात्र चढ़ावे की चोरी का नहीं है। मंदिर के निर्माण में भ्रष्टाचार, ज़मीन की ख़रीद फरोख्त में जालसाज़ी में और बड़े लोग शामिल हैं जो आर एस एस और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हुए हैं। आर एस एस के सुशील और स्वच्छ जीवन आचरण का भ्रम टूट चुका है क्योंकि मंदिर के संचालन में प्रमुख भूमिका उसके लोगों की है। उसके पहले मंदिर आंदोलन के समय इकट्ठा किए गए चंदे में घपले की बात भी की जा रही है।
लेकिन आर एस एस अपनी आदत के मुताबिक़ कह रहा है कि औपचारिक रूप से उसका मंदिर से कोई लेना देना नहीं। उसका काम तो मात्र हिंदुओं का चरित्र निर्माण करना है। आर एस एस के द्वारा निर्मित इस चरित्र के साथ आगे वे क्या-क्या करते हैं, इसके लिए उसे कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? यह अलग मसला है कि आर एस एस के सबसे प्रसिद्ध चरित्रवान स्वयंसेवक आपने जिन कृत्यों के लिए जाने जाते हैं, उन्हें सुचरित्र का नमूना तो नहीं ही माना जाएगा। नाथूराम गोडसे से लेकर नरेंद्र मोदी तक एक पूरी सूची है।
किसी समय हिंदुत्व के सिरमौर और आज सर्वाधिक तिरस्कृत लालकृष्ण आडवाणी को न भूलिए। और अपने कपटी, द्विअर्थी शब्दों के लीचे अपने इरादे को छिपा लेने में निपुण, सबके प्रिय अटल बिहारी वाजपेयी को भी याद कर लीजिए। आर एस एस के बारे में जो पहले उसके आलोचक कहा करते थे, अब ख़ुद उसके भीतर के लोग कह रहे हैं। पारदर्शिता उसका गुण नहीं है। और जो व्यक्तित्व पारदर्शी न हो, जो सार्वजनिक धन का हिसाब देने से इंकार करे, उसके लिए चरित्र और धार्मिकता की परिभाषा ही अलग है।
चढ़ावे की जब बात आई तो दिल्ली के कॉलेजों में पिछले 5-7 सालों में बहाल हुए कुछ अध्यापकों से हुई बातचीत याद आ गई। उन्होंने बतलाया कि बहाली के बाद उन्होंने गुरु दक्षिणा देना शुरू किया है। दिल्ली में पिछले दस वर्षों में आर एस एस को मिली गुरु दक्षिणा उसके पहले के सालों के मुक़ाबले कई कई गुना ज़्यादा होगी। ज़ाहिर है, वह सब ‘स्वैच्छिक’ है। बहाली के पहले क्या हुआ, इसके बारे में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दीपक नैयर अपने एक व्याख्यान में बहुत कुछ बोल चुके हैं।
अगर हम यह नहीं करते तो फिर चढ़ावे की हेरा-फेरी हम सबके लिए कोई बड़ी बात नहीं। मंदिरों और मठों की कार्य शैली से परिचित हैं, उन्हें मालूम है कि वे मात्र आस्था के केंद्र नहीं हैं। भगवान के दर्शन करने, उनसे अपने दुख निवेदित करने और सुख के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनेवाले के लिए तो आस्था के स्थान हैं, लेकिन उसके महंतों और प्रबंधकों के लिए वे आर्थिक हितों के केंद्र भी हैं। मंदिर या मठ में आने वाला चढ़ावा ही नहीं, उससे लगी ज़मीन और उसकी दूसरी संपत्ति उनके लिए धार्मिक आकर्षण का विषय है। हम दूसरे क़िस्म के आकर्षणों की बात नहीं कर रहे हैं। हम जानते हैं कि महंत या पुजारी बनने के लिए जो खून ख़राबा, हत्याएँ होती हैं, वे श्रद्धा की प्रतियोगिता नहीं है। वह मंदिर या मठ की संपत्ति पर क़ब्ज़े की प्रतियोगिता है।
इसका मतलब यह नहीं कि इस घपले पर बात न हो या इसके लिए जवाबदेही न माँगी जाए। आखिर यह जन धन का दुरुपयोग है। जो स्वच्छता की सबसे अधिक दुहाई देते थे, वे ही इसमें लिप्त हैं। तो जवाबदेही तो होनी चाहिए। लेकिन इस क्रम में इस मंदिर का जैसा वैधीकरण किया जा रहा है, उससे हमें विचलित होना चाहिए। कांग्रेस के एक बड़े नेता का बयान पढ़कर तकलीफ़ हुई कि उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के समय चंदा दिया था। उन्हें अल्पसंख्यकों के लिए उनके साहसी स्टैंड के लिए जाना जाता है। लेकिन उन्होंने भी आडवाणी की रथ यात्रा में मंदिर निर्माण के नाम पर चंदा दिया!
इसका मतलब यही है कि वे इस मंदिर निर्माण के माँग को जायज़ मानते थे यह जानते हुए कि यह मंदिर तभी बन सकता था जब बाबरी मस्जिद तोड़ दी जाए। आडवाणी की रथयात्रा का परिणाम हज़ारों मुसलमानों की हत्या और उनके तबाही में हुआ। ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’: इस धमकी को कौन भूल सकता है? एक कवि ने मंदिर के लिए दिए अपने चंदे की रसीद गर्वपूर्वक प्रसारित की थी। राम मंदिर का अभियान हिंदू दिमाग़ को बदलने और भ्रष्ट करने का सबसे बड़ा संगठित अभियान था। इसके मूल में असत्य, घृणा, वर्चस्व की वासना, और राजनीतिक लाभ था। इस अभियान के नतीजे से हासिल होनेवाले मंदिर से किसी नैतिकता या पवित्रता की उपलब्धि का सवाल ही कहाँ था?
अदालत के जिस फ़ैसले से यह मुमकिन हुआ, वह ख़ुद एक बड़ी न्यायिक घपलेबाजी थी। यानी इस मंदिर के निर्माण की पूरी प्रक्रिया अधार्मिक थी, अगर धर्म से हमारी मुराद, सत्य, न्याय और सद्भाव है। लेकिन अदालत के उस फ़ैसले ने भी माना कि यह मंदिर जिस स्थल पर बन रहा है, वहाँ 1949 और 1992 में दो अपराध किए जा चुके हैं: एक सक्रिय मस्जिद में देव मूर्तियों को चोरी से रखने का अपराध और फिर उसे ढाह देने का अपराध। अपराधों की ज़मीन पर पवित्रता का बोध कैसे हो सकता है?
यह साहस हमारे भीतर न रहा कि हम अपने समाज को बता सकें कि छल, असत्य और हिंसा से बनी कोई भी इमारत पवित्रता की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। अभी जो आर्थिक घपला हुआ है, वह जितना गंभीर है, उससे कहीं अधिक गंभीर है पिछले 40 सालों से इस मंदिर के नाम पर हिंदुओं के दिमाग़ के साथ किया गया घपला। अफ़सोस! उस पर कोई बात नहीं कर रहा।
इस विवाद के पीछे एक गहरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है। बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में हुआ था, और यह एक विवादित स्थल रहा है। 19वीं सदी में हिंदू संगठनों ने इस स्थल को अपने धार्मिक अधिकार का प्रतीक माना। 1980 के दशक में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अन्य हिंदुत्ववादी संगठनों ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने का प्रयास किया। यह आंदोलन बाद में देश में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा का कारण बना। 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को और बढ़ावा दिया।
राम मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया है। इसका निर्माण भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा है, जो हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। इस संदर्भ में, राम मंदिर से जुड़े मुद्दे ने भारतीय राजनीति में एक नई दिशा दी है, जहां धार्मिक पहचान और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ एक दूसरे के साथ जुड़ गई हैं।
इस संदर्भ में, चढ़ावे के घोटाले ने न केवल धार्मिक आस्था को प्रभावित किया है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या धार्मिक स्थलों का राजनीतिक उपयोग किया जा सकता है? क्या राजनीतिक दलों को धार्मिक आस्थाओं का दोहन करना चाहिए? ये सवाल न केवल वर्तमान में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि भविष्य में भी इनका प्रभाव पड़ सकता है।
इस विवाद में शामिल सभी पक्षों को जवाबदेही तय करने की आवश्यकता है। यह केवल एक आर्थिक घोटाला नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और धार्मिक मुद्दा भी है। जब तक इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा नहीं की जाती, तब तक समाज में विश्वास और सामंजस्य की बहाली संभव नहीं है।
इसलिए, यह आवश्यक है कि हम इस मुद्दे को गंभीरता से लें और इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करें। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि धार्मिक आस्था और राजनीति के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो गई है। इस स्थिति में सुधार लाने के लिए सभी पक्षों को ईमानदारी से काम करने की आवश्यकता है।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि राम मंदिर का निर्माण और उससे जुड़ा चढ़ावे का घोटाला केवल एक धार्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की जटिलताओं और राजनीतिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमें इस मुद्दे पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है, ताकि हम एक समृद्ध और सामंजस्यपूर्ण समाज की दिशा में आगे बढ़ सकें।
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