सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के आपसी सहमति के संबंधों में पॉक्सो कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि 15-18 साल की उम्र प्रयोग की होती है।
चंडीगढ़, भारत 13 जुल॰ 2026 ALN: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में किशोरों के आपसी सहमति के संबंधों में पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences) कानून के दुरुपयोग पर गहरी चिंता जताई है। इस संदर्भ में, न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि 15-18 साल की उम्र प्रयोग की होती है और इस उम्र के युवा अक्सर माता-पिता के सामाजिक सम्मान के चक्कर में जेल चले जाते हैं। इस मामले में व्यावहारिक सुधारों और शिक्षा को लेकर अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
किशोरों के आपसी संबंधों में पॉक्सो कानून के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति बीवी नागरथना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि जब 16 से 18 साल के बच्चे आपस में रिश्ता बनाकर चले जाते हैं, तो माता-पिता अपने तथाकथित सम्मान की रक्षा के लिए उन पर आपराधिक केस दर्ज करा देते हैं। यह स्थिति न केवल किशोरों के लिए बल्कि उनके परिवारों के लिए भी गंभीर समस्याएं पैदा कर रही है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य किसी लड़के और लड़की के भागने को भला कैसे रोक सकता है? पॉक्सो कानून बच्चों के यौन उत्पीड़न और शोषण को रोकने के लिए बनाया गया है। 15 से 18 साल की उम्र बहुत संवेदनशील होती है। यह जीवन में प्रयोग करने की उम्र है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन मामलों को वास्तव में पॉक्सो का केस माना जाना चाहिए? अदालत ने चिंता जताई कि ऐसे मामलों में आखिर में हमें युवाओं को बरी ही करना पड़ता है।
इस पूरे मामले का संबंध किशोरों के निजता के अधिकार से भी है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट खुद संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है। दरअसल, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में किशोर लड़कियों को 'दो मिनट के आनंद' के लिए रिश्तों में न फंसने और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दी थी। यह टिप्पणी न केवल विवादास्पद थी, बल्कि इसने किशोरों के अधिकारों पर भी सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित टिप्पणी को पूरी तरह खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने शीर्ष अदालत को बताया कि जिस घटना से यह विवाद शुरू हुआ था, वह अब पूरी तरह सुलझ चुका है। यह मामला एक नाबालिग लड़की के 25 साल के व्यक्ति के साथ भागने का था। सुप्रीम कोर्ट की बनाई समिति और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बातचीत के बाद रिपोर्ट दी गई थी कि इस तरह के पॉक्सो मामलों में हमारी मौजूदा व्यवस्था कैसे विफल हो रही है।
वकील माधवी दीवान ने बताया कि वह लड़की अब अपने पति के साथ बहुत खुश है और पूरी तरह सेटल हो चुकी है। उन्होंने कहा कि असली समस्या 17-18 साल के लड़कों को जेल भेजने की है, जिससे उनका जीवन खराब होता है। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि समाज के लिए भी चिंताजनक है।
केंद्र सरकार के वकील ने इस पर सुझाव दिया कि कक्षा छह से ही बच्चों को पॉक्सो कानून और किशोर शिक्षा के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। यह सुझाव इस बात को दर्शाता है कि किशोरों को अपने अधिकारों और कानूनों के बारे में समझ होना आवश्यक है, ताकि वे सही निर्णय ले सकें और किसी भी प्रकार के दुरुपयोग से बच सकें।
इस मुद्दे का गहरा सामाजिक और कानूनी महत्व है। किशोरावस्था एक ऐसा चरण है जब युवा अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं। ऐसे में अगर उन्हें कानून और उनके अधिकारों के बारे में सही जानकारी नहीं है, तो इसका दुष्प्रभाव उनके जीवन पर पड़ सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पॉक्सो कानून का दुरुपयोग इस बात का संकेत है कि समाज में अभी भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विचार करने की आवश्यकता है। यह जरूरी है कि किशोरों को अपनी इच्छाओं और भावनाओं के बारे में खुलकर बात करने का अवसर मिले, ताकि वे सही फैसले ले सकें।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने न केवल किशोरों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक नया दृष्टिकोण पेश किया है, बल्कि यह भी दर्शाया है कि समाज को भी किशोरों के संबंधों और उनकी स्वतंत्रता को समझने की आवश्यकता है। यह समझना जरूरी है कि किशोरों की भावनाएं और इच्छाएं भी महत्वपूर्ण हैं, और उन्हें अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।
किशोरों के मामलों में कानून का सही उपयोग न केवल उनके लिए बल्कि समाज के लिए भी फायदेमंद होगा। यदि किशोरों को उनके अधिकारों और कानूनों के बारे में सही जानकारी दी जाए, तो वे न केवल अपने जीवन में बेहतर निर्णय ले सकेंगे, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम होंगे।
इस बेहद महत्वपूर्ण मामले पर अगली सुनवाई अब शुक्रवार, 17 जुलाई को होगी। यह सुनवाई न केवल किशोरों के अधिकारों के लिए बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट होगा कि कैसे कानून को किशोरों की भलाई के लिए बेहतर ढंग से लागू किया जा सकता है, और कैसे समाज में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन की ओर इशारा करती है, जिसमें किशोरों के अधिकारों और उनकी निजता का सम्मान किया जाना चाहिए। यह समय है कि समाज, परिवार और कानून सभी मिलकर इस दिशा में कदम उठाएं, ताकि युवा अपनी जिंदगी को सही तरीके से जी सकें और उन्हें न्याय मिल सके।
इस संदर्भ में, यह भी महत्वपूर्ण है कि समाज में मौजूद पारंपरिक सोच और मान्यताओं को चुनौती दी जाए। अक्सर देखा गया है कि किशोरों के संबंधों को परिवार की इज्जत से जोड़कर देखा जाता है, जिससे उन्हें अपने निजी जीवन में निर्णय लेने में कठिनाई होती है। ऐसे में, यदि हम किशोरों को उनके अधिकारों और स्वतंत्रता के प्रति जागरूक नहीं करेंगे, तो यह सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि समाज के लिए भी एक बड़ा खतरा बन सकता है।
किशोरों के लिए एक सुरक्षित और समर्थनकारी वातावरण बनाना आवश्यक है, ताकि वे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें और अपने जीवन के फैसले स्वतंत्रता से ले सकें। यह न केवल उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा, बल्कि इससे समाज में भी एक सकारात्मक बदलाव आएगा।
अंत में, यह कहना उचित होगा कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक आवश्यक कदम है, जो किशोरों के अधिकारों, उनकी निजता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक नई दिशा दिखाती है। यह समय है कि हम सभी मिलकर इस दिशा में काम करें, ताकि हमारे युवा सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सकें।
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