जापान के फुजिसावा में पहली मस्जिद के निर्माण पर विवाद

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Aug 1, 2026, 06:42 AM IST
7 min read
  • linkedin
  • twitter
  • facebook
  • instagram
  • whatsapp

फुजिसावा शहर में पहली मस्जिद के निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों में तीखी बहस चल रही है, जो जापान में सामाजिक बदलाव और इमिग्रेशन पर सवाल उठाती है।

फुजिसावा, जापान की राजधानी टोक्यो से क़रीब एक घंटे की ड्राइव की दूरी पर समुद्र किनारे बसा एक शांत शहर है।

जल्द ही फुजिसावा शहर की पहली मस्जिद का निर्माण शुरू होने वाला है।

कई सालों से यहाँ रह रहीं नोरिको इज़ुमिज़ावा कहती हैं, "इसकी वजह से हमारा समाज किस तरह बदल सकता है, मुझे चिंता होती है।"

यहाँ एक इस्लामिक धार्मिक स्थल बनाने की योजना ने लोगों के बीच अलग-अलग तरह की भावनाएं पैदा कर दी हैं।

इस मुद्दे को लेकर ग़ुस्सा और डर भी है, तो वहीं उम्मीद और इसे स्वीकार करने की भावना भी दिखाई देती है।

यह बहस जापान में घटती और बुज़ुर्ग होती आबादी की वजह से पैदा हुई मज़दूरों की कमी, इमिग्रेशन (प्रवासन) और सामाजिक बदलाव को लेकर बढ़ती चिंताओं को उजागर करती है।

हालांकि इमिग्रेशन (प्रवासन) जापान में राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सीमित चर्चा वाला मुद्दा रहा है, लेकिन देश अब ख़ाली हो रहे पदों को भरने के लिए ज़्यादातर विदेशी कामगारों पर निर्भर है।

इसका मतलब है कि अलग-अलग संस्कृतियों, भाषाओं, धर्मों और जीवनशैलियों वाले प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है।

ऐसा महसूस करने वाली इज़ुमिज़ावा अकेली नहीं हैं। वह फुजिसावा के उन स्थानीय लोगों के समूह में शामिल हैं, जो मुस्लिम समुदाय की बढ़ती मौजूदगी को लेकर फ़िक्रमंद हैं।

उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोप में इमिग्रेशन (प्रवासन) को लेकर चल रही विवादित बहसों ने भी उनकी चिंताओं को बढ़ा दिया है।

इस साल की शुरुआत में स्थानीय रेलवे स्टेशन पर मस्जिद के विरोध में प्रदर्शन हुए थे, जिसमें हज़ारों लोग प्रस्तावित मस्जिद के निर्माण का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आए थे।

कुछ लोगों का तर्क है कि पास में मौजूद जापानी शिंतो धार्मिक स्थल से कहीं बड़ी मस्जिद बनाना अनादर जैसा है।

इसके अलावा जापानी सोशल मीडिया पर नफ़रत भरे बयान और ग़लत जानकारी फैलाए जाने की ख़बरें भी सामने आई हैं।

स्थानीय मीडिया के मुताबिक, कुछ मस्जिदों को अपमानजनक फोन कॉल और ईमेल मिल रहे हैं। इनमें से कुछ मामलों के बाद नफ़रत विरोधी समूहों को नफ़रत फैलाने से रोकने की मांग को लेकर जवाबी प्रदर्शन करने पड़े।

जिस जगह पर फुजिसावा मस्जिद का निर्माण होना है, उसके सामने वाली सड़क के दूसरी तरफ हिरोकी सुज़ुका कॉफी शॉप चलाते हैं। वो बेहतर समझ और बातचीत को बढ़ावा देने की बात करते हैं।

उन्होंने कहा, "मैं इसका ख़ास विरोध नहीं करता, लेकिन मैं यह भी नहीं कहूंगा कि मैं इसके समर्थन में हूँ।"

"मुझे लगता है कि पहला क़दम उन्हें समझने से शुरू होता है, वे किस तरह के लोग हैं और उनके वैल्यूज़ और सोच क्या हैं।"

जापान में मुसलमानों की क्या स्थिति है?

बिज़नेसमैन मोहम्मद मोहिदीन पिछले 39 सालों से ओसाका में रह रहे हैं। बेहतर रोज़गार के अवसरों की तलाश में वह 1987 में अपने मूल देश श्रीलंका से जापान आए थे।

उन्होंने पहले क़ीमती रत्नों का कारोबार किया और बाद में श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में पुरानी कारों के निर्यात का काम शुरू किया।

वह ऐसे समय में जापान आए थे, जब यहां विदेशी निवासियों की संख्या काफ़ी कम थी।

लेकिन मोहिदीन का मानना है कि अब स्थानीय लोगों का रवैया पहले की तुलना में ज़्यादा नकारात्मक हो गया है और मुस्लिम समुदाय के लोगों को ऑनलाइन और आमने-सामने अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है।

मोहिदीन ने बताया, "सोशल मीडिया पर ऐसी अनगिनत टिप्पणियां देखने को मिलती हैं, जिनमें लिखा होता है, 'जापान छोड़कर चले जाओ' और 'अपने देश वापस लौट जाओ'। इसके अलावा कुछ लोग मस्जिद में आकर भी अपशब्द बोलने लगे हैं।"

मोहिदीन ने स्थानीय इस्लामिक समुदाय के सदस्य हैं और रोज़ नमाज़ पढ़ने और अन्य धार्मिक गतिविधियों के लिए ओसाका की मस्जिद जाते हैं।

वह कहते हैं कि उन्हें कभी अपनी जान को ख़तरा महसूस नहीं हुआ।

कई सालों से पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध होने के बावजूद मोहिदीन ने हाल के समय में मुस्लिम समुदाय को लेकर लोगों के रवैये में बदलाव महसूस किया है।

उन्होंने कहा, "अब मुझे लगता है कि लोगों को हमसे डर लगने लगा है।"

उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में मौखिक दुर्व्यवहार की घटनाएं बढ़ी हैं। मुस्लिम समुदाय के लोगों को आतंकवादी कहा गया, उन पर बम बनाने के आरोप लगाए गए और उन्हें जापान छोड़ने के लिए कहा गया।

मोहिदीन ने कहा, "जब ऐसा होता है, तो हमें धैर्य रखना पड़ता है।"

"वे हमें उकसाने की कोशिश करते हैं ताकि हम ग़ुस्से में प्रतिक्रिया दें या उनसे भिड़ जाएं। वे देखना चाहते हैं कि हम कब तक यह सब सहन कर सकते हैं।"

"इसलिए हम शांत रहते हैं, विनम्रता से बात करते हैं और उनके साथ अच्छे व्यवहार की कोशिश करते हैं, क्योंकि जापान के बहुत से लोगों को इस्लाम के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है।"

हालांकि, उनका मानना है कि इस दूरी को बढ़ाने में कुछ हद तक मुस्लिम समुदाय भी ज़िम्मेदार है।

वह कहते हैं, "हमने सिर्फ़ अपने काम पर ध्यान दिया और लंबे समय तक लोगों को यह समझाने की पर्याप्त कोशिश नहीं की कि हम कौन हैं। हमने ख़ुद को इस समाज का हिस्सा बनाने के लिए भी उतने प्रयास नहीं किए।"

"अब मैं बातचीत बढ़ाने और एक-दूसरे के बीच बेहतर समझ बनाने के लिए काम करना चाहता हूं।"

61 वर्षीय शकील मोहम्मद पिछले एक दशक से सैतामा प्रांत की याशिओ मस्जिद का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

पाकिस्तान से जापान आने के बाद उन्होंने 26 साल तक कंस्ट्रक्शन साइट सुपरवाइज़र के तौर पर काम किया है और वह अच्छी तरह जापानी भाषा बोलते हैं।

मोहम्मद कहते हैं कि सबसे ज़रूरी बात जापान के नियमों का पालन करना है। इसमें कचरे को सही तरीक़े से अलग करना, पार्किंग के नियमों का पालन करना और साइकिल चलाते समय हेलमेट पहनना शामिल है।

उन्होंने कहा, "हम जापान के तौर-तरीक़ों का सम्मान करने और नियमों का पालन करने की पूरी कोशिश करते हैं। यहां लोगों को नमस्कार करना जैसी छोटी-छोटी बातों में भी शिष्टाचार बहुत मायने रखता है।"

उन्होंने बताया कि याशिओ में रहने वाले कुछ जापानी लोग इलाक़े के पाकिस्तानी समुदाय को मज़ाक में "याशिओ-स्तान" कहकर बुलाते हैं।

"यह सच है कि कुछ पाकिस्तानी लोग ग़लत व्यवहार करते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। यही बात जापानी लोगों पर भी लागू होती है।"

दूसरे देशों से जापान आने वाले लोगों की स्थिति क्या है?

जापान बड़े जनसांख्यिकीय बदलावों के बीच अपनी पहचान बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रहा है।

जापान में धर्म का अध्ययन करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफे़सर एमेरिटस हिरोफुमी तनादा के अनुसार, जापान में विदेशी निवासियों और जापानी धर्मों को मानने वाले लोगों की संख्या 2024 के अंत तक लगभग 4.2 लाख दर्ज की गई थी, जो 2019 में 2.3 लाख थी।

जापान में बढ़ती मुस्लिम आबादी भी देश में हो रहे व्यापक बदलाव का हिस्सा है।

जापान में रहने वाले विदेशी लोगों की संख्या, 2025 में 40 लाख से अधिक हो गई थी। इनमें ज़्यादातर लोग चीन, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस से आते हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इनमें से करीब 25.7 लाख लोग जापान में काम कर रहे हैं। इसी साल जापान की कुल आबादी में लगभग 10 लाख की कमी दर्ज की गई थी।

सरकारी अधिकारी लंबे समय से जापान को इमिग्रेशन देश कहने से बचते रहे हैं। हालांकि, वे ऐसे वीज़ा देने पर जोर देते हैं, जिन्हें स्थायी प्रवास के बजाय अस्थायी काम के लिए माना जाता है। आलोचक इसे "छिपी हुई इमिग्रेशन व्यवस्था" कहते हैं।

इसके बावजूद प्रधानमंत्री सना ताकाइची ने बड़े पैमाने पर इमिग्रेशन को लेकर काफ़ी सख़्त और रूढ़िवादी रुख़ अपनाया है।

Get More Updates

To learn more about the latest developments in Islam, stay updated with our exclusive reports and analyses on AiLensNews.

Related News