छत्तीसगढ़ के भोजली पर्व को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की तैयारी: बिलासपुर में जन कल्याण समिति बोली- यह हमारा ‘फ्रेंडशिप डे’, भोजली घाट के विकास की मांग

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Aug 25, 2026, 07:38 PM IST
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बिलासपुर में जन कल्याण समिति ने भोजली पर्व को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए अभियान शुरू किया है, इसे छत्तीसगढ़ का ‘फ्रेंडशिप डे’ बताया गया है।

बिलासपुर में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक संस्कृति और भोजली पर्व को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए जन कल्याण समिति ने एक महत्वपूर्ण अभियान शुरू किया है। यह पहल न केवल स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास है, बल्कि इसे पूरे देश में पहचान दिलाने का भी एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। समिति का उद्देश्य भोजली की परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ना और इसे छत्तीसगढ़ की सीमाओं से बाहर देशभर तक पहुंचाना है।

भोजली पर्व, जो कि छत्तीसगढ़ की एक प्राचीन और समृद्ध लोक परंपरा है, मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। इस पर्व के दौरान महिलाएं एकत्रित होकर विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक रस्में निभाती हैं। समिति के संयोजक विष्णु यादव, दीपमाला गुप्ता, देवनारायण साहू, राजू यादव, राखी यादव, मनोरमा यादव और पप्पू ठाकुर ने पत्रकारों से चर्चा में भोजली पर्व की परंपराओं और आयोजन की जानकारी दी।

मितान-गियां बदलने और महाप्रसाद की परंपरा

भोजली पर्व में महिलाएं उत्साह के साथ शामिल होती हैं। इस दौरान मितान-गियां बदलने और महाप्रसाद बांटने जैसी पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं। भोजली पर्व केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता, भाईचारे और आपसी संबंधों को मजबूत करने वाली लोक परंपरा है। यह पर्व समुदाय के लोगों को एक साथ लाने का एक साधन है, जो पारिवारिक और सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है।

समिति का कहना है कि युवा पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक संस्कृति और लोक पर्वों से दूर हो रही है। ऐसे में भोजली जैसे आयोजनों के जरिए युवाओं को अपनी जड़ों और स्थानीय परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यह एक सकारात्मक कदम है, जो न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने में मदद करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी पहचान से जोड़ने का काम करेगा।

गांव-गांव प्रचार, महिलाओं की टोली पहुंचती है

आयोजन से अधिक से अधिक ग्रामीणों को जोड़ने के लिए गांवों की सूची तैयार कर ऑटो के माध्यम से प्रचार किया जाता है। इसके बाद अलग-अलग गांवों से महिलाओं की टोलियां अपनी भोजली लेकर आयोजन स्थल तक पहुंचती हैं। यह प्रक्रिया न केवल आयोजन को सफल बनाती है, बल्कि विभिन्न गांवों के बीच आपसी संबंधों को भी प्रगाढ़ करती है। आयोजन में विभिन्न प्रतियोगिताएं भी कराई जाती हैं और आकर्षक पुरस्कार दिए जाते हैं, जिससे उत्साह और बढ़ता है।

2023 से अरपा किनारे आयोजन का विस्तार

आयोजकों ने बताया कि 2023 में अरपा नदी किनारे आयोजन के लिए बड़ा स्थान मिलने के बाद भोजली पर्व का स्वरूप और व्यापक हुआ। यह स्थान न केवल आयोजन के लिए उपयुक्त है, बल्कि इसे एक स्थायी स्थल के रूप में विकसित करने की संभावनाएं भी प्रदान करता है। अब समिति इसे छत्तीसगढ़ की सीमाओं से बाहर देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है, ताकि देशभर के लोग इस लोक पर्व और इसकी परंपराओं को जान सकें। इस पहल से भोजली पर्व को एक राष्ट्रीय पहचान मिलने की संभावना है, जो इसे और भी महत्वपूर्ण बना सकती है।

भोजली घाट के विकास की मांग

समिति ने अरपा नदी किनारे भोजली घाट के स्थायी और व्यवस्थित विकास का मुद्दा भी उठाया। पदाधिकारियों के अनुसार, कई वर्षों से घाट के विकास की मांग स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों के सामने रखी जा रही है, लेकिन अब तक अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है। समिति ने भोजली पर्व की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए घाट के विकास को प्राथमिकता देने की मांग की है। यह विकास न केवल स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि स्थानीय समुदाय के लिए भी आर्थिक अवसर प्रदान करेगा।

इसके अलावा, घाट का विकास स्थानीय संस्कृति को संरक्षित करने और इसे बढ़ावा देने का एक साधन भी होगा। यदि भोजली घाट का विकास ठीक से किया जाता है, तो यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थल बन सकता है, जहाँ लोग न केवल भोजली पर्व का आनंद ले सकेंगे, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का अनुभव भी कर सकेंगे।

समिति की यह पहल यह दर्शाती है कि स्थानीय परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। यह न केवल छत्तीसगढ़ की संस्कृति को सहेजने का काम कर रहा है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन का हिस्सा भी बन रहा है। इस प्रकार, भोजली पर्व को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की इस कोशिश का परिणाम न केवल स्थानीय समुदाय के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

भोजली पर्व की इस यात्रा में, लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना, स्थानीय संस्कृति को सहेजना और इसे एक व्यापक मंच पर लाना एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल भोजली पर्व की पहचान बढ़ेगी, बल्कि यह अन्य स्थानीय पर्वों और परंपराओं को भी प्रेरित कर सकता है, जिससे भारतीय संस्कृति की विविधता और समृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।

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