असम की नृत्यांगना उषा ने विद्यार्थियों को सिखाईं मुद्राएं और नवरस

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 19, 2026, 05:30 AM IST
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बिलासपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में असम की नृत्यांगना उषा रानी वैश्य ने विद्यार्थियों को शास्त्रीय नृत्य की मुद्राएं और नवरस का महत्व समझाया।

सिटी रिपोर्टर | बिलासपुर

हाल ही में, स्पिकमैके के तत्वावधान में आधारशिला विद्या मंदिर न्यू सैनिक स्कूल में एक अनूठा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें असम की प्राचीन शास्त्रीय नृत्य शैली सत्रीय पर आधारित ज्ञानवर्धक प्रस्तुति दी गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना था, जिसमें नृत्य, संगीत और संवाद के माध्यम से नवरस और भारतीय ज्ञान परंपरा की जानकारी दी गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के अध्यक्ष डॉ. अजय श्रीवास्तव, निदेशक एसके जनास्वामी और प्राचार्या जीआर मधुलिका की उपस्थिति में हुआ। इस कार्यक्रम की मुख्य प्रस्तुति असम की सुप्रसिद्ध सत्रीय नृत्यांगना एवं कोरियोग्राफर उषा रानी वैश्य ने दी, जो अपने क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम हैं। उषा रानी वैश्य को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। वे संस्कृति मंत्रालय की वरिष्ठ शोध फेलो, प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय के प्रदर्शन कला विभाग की संकाय सदस्य और दूरदर्शन की 'ए' ग्रेड कलाकार हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत उषा रानी वैश्य ने वंदना से की, जो कि एक भावपूर्ण प्रस्तुति थी। इस प्रस्तुति ने विद्यार्थियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद स्वर पर उपेन बरगायन, खोल वादन पर कृष्णकांत दास और ताल संगत पर डॉ. जादव बोरा ने अपनी प्रस्तुति दी। उषा रानी वैश्य ने विद्यार्थियों को बताया कि सत्रीय नृत्य भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति असम के वैष्णव सत्रों में हुई है।

सत्रीय नृत्य की उत्पत्ति 15वीं शताब्दी में महान संत श्रीमंत शंकरदेव द्वारा हुई थी। उन्होंने इस नृत्य शैली को विकसित किया, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों से जुड़ी भक्तिमय कथाओं का नृत्य, अभिनय और संगीत के माध्यम से प्रस्तुतीकरण किया जाता है। इस नृत्य का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह न केवल एक कला है, बल्कि यह आध्यात्मिकता और भक्ति का भी प्रतीक है।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर विद्यालय प्रबंधन ने सभी कलाकारों का स्मृति-चिह्न देकर सम्मान किया। विद्यालय के अध्यक्ष डॉ. अजय श्रीवास्तव ने इस अवसर पर कहा कि भारतीय शास्त्रीय कलाएं केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि ये चरित्र निर्माण, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों के विकास का प्रभावी माध्यम भी हैं।

कार्यक्रम की एक विशेषता इसका संवादात्मक स्वरूप था। उषा रानी वैश्य ने विभिन्न हस्तमुद्राओं, गतियों और नेत्राभिनय का प्रदर्शन करते हुए विद्यार्थियों से उनके अर्थ पूछे। इससे विद्यार्थियों ने जाना कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रत्येक मुद्रा का अपना विशिष्ट अर्थ, उद्देश्य और सौंदर्यशास्त्रीय महत्व होता है।

उषा रानी वैश्य ने भारतीय परंपरा में वर्णित 64 कलाओं का भी परिचय कराया और बताया कि प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में कला को व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता था। यह कला न केवल शारीरिक कौशल को विकसित करती है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक विकास में भी सहायक होती है।

कार्यक्रम का सबसे आकर्षक हिस्सा नवरसों की प्रस्तुति रही। श्रृंगार, वीर, अद्भुत, शांत, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक और वीभत्स रसों का अभिनय करते हुए उषा रानी वैश्य ने विद्यार्थियों को बताया कि जीवन में प्रत्येक भावना का अपना महत्व है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सभी रस व्यक्ति के भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नवरसों की प्रस्तुति ने विद्यार्थियों को न केवल नृत्य की तकनीक से अवगत कराया, बल्कि उन्हें भावनाओं की गहराई को भी समझाया।

इस प्रकार का कार्यक्रम न केवल विद्यार्थियों के लिए एक शैक्षणिक अनुभव था, बल्कि यह उन्हें भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता से भी अवगत कराने का एक प्रयास था। असम की सत्रीय नृत्य शैली, जो कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, को समझना और उसका अनुभव करना विद्यार्थियों के लिए एक अनमोल अवसर था।

इस कार्यक्रम ने यह भी दर्शाया कि कैसे कला और संस्कृति का समावेश शिक्षा में किया जा सकता है। जब विद्यार्थी कला के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो वे न केवल एक विषय को समझते हैं, बल्कि वे अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को भी व्यक्त करने में सक्षम होते हैं। ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन न केवल विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक होता है, बल्कि यह उन्हें भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूक और संवेदनशील भी बनाता है।

अंत में, इस कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य और कला का महत्व केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में संवेदनशीलता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों के विकास में भी योगदान देता है। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से, हम न केवल अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेज सकते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी इसके महत्व से अवगत करा सकते हैं।

भारतीय संस्कृति की समृद्धि और विविधता को समझने के लिए, इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन अत्यंत आवश्यक है। सत्रीय नृत्य न केवल असम की पहचान है, बल्कि यह पूरे देश की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक भी है। यह नृत्य शैली न केवल कला का माध्यम है, बल्कि यह असम की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतिनिधित्व करती है।

सत्रीय नृत्य में नृत्यांगनाओं की मुद्राएं, गतियां और भाव-भंगिमाएं गहरी अर्थवत्ता रखती हैं। उषा रानी वैश्य जैसे कलाकारों के माध्यम से, विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिलता है कि कैसे नृत्य केवल शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक गहन भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव भी है। यह नृत्य शैली न केवल दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि उन्हें एक नई दृष्टि और संवेदनशीलता के साथ जीवन को देखने का अवसर भी देती है।

इस कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों ने यह भी सीखा कि कला का अभ्यास केवल व्यक्तिगत विकास के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। कला के माध्यम से, हम अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, जो समाज में संवाद और सहिष्णुता को बढ़ावा देने में सहायक होता है।

असम की सत्रीय नृत्य शैली के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन आवश्यक है। यह न केवल विद्यार्थियों को नृत्य की तकनीक सिखाता है, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता से भी अवगत कराता है।

इस प्रकार, इस कार्यक्रम ने शिक्षकों, विद्यार्थियों और समाज के सभी वर्गों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया कि कला और संस्कृति को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए। जब हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजते हैं और उसे आगे बढ़ाते हैं, तो हम न केवल अपने अतीत को सम्मान देते हैं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को भी एक समृद्ध और संवेदनशील समाज की ओर ले जाते हैं।

अंततः, इस कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य और कला का महत्व केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में संवेदनशीलता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों के विकास में भी योगदान देता है। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से, हम न केवल अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेज सकते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी इसके महत्व से अवगत करा सकते हैं।

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