पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अपनी किताब में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आत्महत्या के बयान का जिक्र किया है, जो 2012 में चुनाव आयोग के खिलाफ टिप्पणी के बाद आया था।
नई दिल्ली, भारत 12 जुल॰ 2026 ALN: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अपनी किताब ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर’ में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से जुड़ा एक इमोनशनल मोमेंट साझा किया है। यह किताब न केवल कुरैशी के व्यक्तिगत अनुभवों का संग्रह है, बल्कि यह भारतीय राजनीति और प्रशासन की जटिलताओं को भी उजागर करती है। इस पुस्तक में कुरैशी ने 2012 में चुनाव आयोग के खिलाफ कुछ मंत्रियों की टिप्पणियों की शिकायत सुनने के बाद मनमोहन सिंह के साथ हुई बातचीत का उल्लेख किया है। इस बातचीत में सिंह ने कुरैशी से कहा था, "अगर आपको ऐसा लगता है, तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।" यह बयान उस समय की राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है, जब चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे थे।
मनमोहन सिंह ने कुरैशी से यह भी कहा था कि इलेक्शन कमीशन केवल भारत का गौरव नहीं है, बल्कि यह देश के लोकतंत्र की आत्मा है। उनका यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि वे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी कार्यप्रणाली को कितना महत्वपूर्ण मानते थे। सिंह का यह विचार कि यदि हम चुनाव आयोग को खो देते हैं, तो हम सब कुछ खो देंगे, लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
कुरैशी ने अपनी किताब में सिंह की एक ऐसे नेता के रूप में तारीफ की है, जिनके लिए संवैधानिक मर्यादा केवल बातचीत का मुद्दा नहीं, बल्कि एक जीता-जागता विश्वास था। यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि सिंह ने अपने कार्यकाल में संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए कितनी मेहनत की। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय राजनीति में संवैधानिकता और लोकतंत्र की मूलभूत आवश्यकताओं को समझने में सहायक है।
कुरैशी, जो भारत के 17वें मुख्य चुनाव आयुक्त रहे हैं, ने चुनावी सुधारों की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने वोटर एजुकेशन डिवीजन, एक्सपेंडिचर मॉनिटरिंग डिवीजन और इंडिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन मैनेजमेंट (IIIDEM) जैसे संस्थानों की स्थापना की। ये पहलें भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने और चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन संस्थानों ने न केवल चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया, बल्कि मतदाता जागरूकता को भी बढ़ाने में मदद की।
पुस्तक में कुरैशी ने उस घटनाक्रम का विस्तृत वर्णन किया है, जो 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान घटित हुआ। तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम आरक्षण बढ़ाने का चुनावी वादा किया था। इस वादे को लेकर भाजपा ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद आयोग ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए खुर्शीद को फटकार लगाई थी। यह घटना चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग की भूमिका को दर्शाती है।
इसके बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने चुनाव आयोग को मनमौजी और अहंकारी बताना शुरू कर दिया, जिससे आयोग के सदस्यों को आहत महसूस हुआ। यह स्थिति दर्शाती है कि राजनीतिक दलों के बीच चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर मतभेद हो सकते हैं, जो लोकतंत्र के लिए चिंताजनक हो सकता है। इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं राजनीतिक दलों के बीच चुनाव आयोग की भूमिका के प्रति सम्मान की कमी को भी उजागर करती हैं।
ईद मिलन समारोह के दौरान, मनमोहन सिंह ने तत्कालीन पीएम के प्रेस सचिव हरीश खरे से अपनी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि यह बात प्रधानमंत्री तक पहुंचनी चाहिए। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि सिंह ने अपने मंत्रियों और चुनाव आयोग के बीच के रिश्तों को लेकर कितनी गंभीरता से विचार किया। उनकी यह सक्रियता यह दर्शाती है कि वे चुनाव आयोग के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से लेते थे।
अगले ही दिन, पीएमओ से फोन आया और मनमोहन सिंह ने कुरैशी को उसी शाम मिलने के लिए बुलाया। जब कुरैशी प्रधानमंत्री आवास पहुंचे, तो डॉ. सिंह दरवाजे पर उनका इंतजार कर रहे थे। इस प्रकार की व्यक्तिगत मुलाकातें यह दर्शाती हैं कि सिंह ने प्रशासनिक मामलों में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने का प्रयास किया। यह दर्शाता है कि वे अपनी सरकार के कार्यों के प्रति कितने सजग और चिंतित थे।
कुरैशी के अनुसार, सिंह ने गुस्से में कहा, "हरीश ने मुझे बताया कि आपने क्या कहा। अगर आप ऐसा सोचते हैं, तो मैं सुसाइड कर लूंगा।" इस बयान ने कुरैशी को चौंका दिया। उन्होंने लिखा है कि उनकी बात कुछ मंत्रियों के बर्ताव के बारे में थी, न कि सिंह के बारे में। यह स्थिति दर्शाती है कि मनमोहन सिंह अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और राजनीतिक स्थिति को लेकर कितने चिंतित थे।
कुरैशी ने सिंह की बातें याद करते हुए कहा कि यह सोचना कि वह एक पल के लिए भी सोच सकते हैं कि उन्हें उनके इरादों पर शक है, उनके लिए बर्दाश्त से बाहर था। उन्हें शांत करने में कुछ मिनट लगे। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि सिंह को अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और राजनीतिक स्थिति की कितनी चिंता थी।
कुरैशी की किताब में उनकी जिंदगी के सौ दिलचस्प किस्से-कहानियों का संग्रह है। इनमें उन घटनाओं, मुश्किलों और अचानक आए मोड़ों के बारे में बताया गया है, जिन्होंने सिविल सर्विस में उनके करियर को खास बनाया। यह किताब कुरैशी के जीवन की उन घटनाओं पर रोशनी डालती है, जिसमें 2012 में इलेक्शन कमीशन ने पंजाब के ड्रग संकट को पकड़ना, वह MoU जिसने डोनाल्ड ट्रम्प और एलन मस्क को हैरान कर दिया और कैसे TRP का इस्तेमाल दूरदर्शन को छोटा करने और उसके विज्ञापन के पैसे को दूसरी जगह लगाने के लिए किया गया।
कुरैशी की यह किताब न केवल एक व्यक्तिगत जीवन की कहानी है, बल्कि यह भारतीय राजनीति, चुनावी प्रक्रिया और प्रशासनिक चुनौतियों की गहरी समझ भी प्रदान करती है। यह किताब उन सभी लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ हो सकती है, जो भारतीय लोकतंत्र और उसके कार्यप्रणाली के बारे में जानने में रुचि रखते हैं।
कुल मिलाकर, कुरैशी की किताब एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो भारतीय राजनीति में संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष और चुनौतियों को दर्शाती है। यह पुस्तक पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे एक मजबूत लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए सभी संस्थाओं के बीच सहयोग और सम्मान की आवश्यकता है। भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को समझने के लिए यह किताब एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकती है, जो भविष्य में राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान कर सकती है।
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