सुप्रीम कोर्ट ने गोहाटी हाईकोर्ट के विदेशी घोषित करने वाले फैसले रद्द किए

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 13, 2026, 01:18 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने गोहाटी हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि नागरिकता का निर्धारण निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रक्रिया से होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता या विदेशी होने का निर्धारण "निष्पक्ष, वैध और न्यायसंगत प्रक्रिया" के जरिए ही किया जाना चाहिए। इस निर्णय ने नागरिकता के मुद्दे पर एक बार फिर से ध्यान केंद्रित किया है, जो भारतीय संविधान और कानून के तहत अत्यंत महत्वपूर्ण है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकता का प्रश्न संविधान और कानून की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए इस संबंध में लिया गया कोई भी निर्णय पूरी तरह निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए।

जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने गोहाटी हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें 27 अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) के आदेशों को बरकरार रखा गया था। यह मामला असम राज्य में नागरिकता के मुद्दों से संबंधित है, जहां लंबे समय से विदेशी नागरिकों की पहचान और उनके अधिकारों को लेकर विवाद चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मामलों को नए सिरे से सुनवाई के लिए संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों के पास वापस भेज दिया।

नागरिकता का सवाल अत्यंत संवैधानिक महत्व का

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि "नागरिकता और विदेशी होने की स्थिति संविधान तथा कानून के क्षेत्र में अत्यधिक महत्व रखती है।" अदालत ने माना कि सरकार का यह वैध और महत्वपूर्ण हित है कि जो लोग कानूनी रूप से भारतीय नागरिक नहीं हैं, वे झूठे दावों, प्रक्रिया के दुरुपयोग या अनावश्यक देरी का लाभ उठाकर भारतीय नागरिकता हासिल न कर सकें। यह एक संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि असम में कई नागरिकों को विदेशी घोषित किए जाने के कारण उनके अधिकारों का हनन हुआ है।

अदालत ने कहा, "राज्य का यह वैध और महत्वपूर्ण हित है कि जो व्यक्ति भारतीय नागरिकता के पात्र नहीं हैं, वे झूठे दावों, प्रक्रिया के दुरुपयोग या देरी का फायदा उठाकर नागरिकता प्राप्त न कर लें।" हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता की कीमत पर हासिल नहीं किया जा सकता। यह निर्णय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जो यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को बिना उचित सुनवाई के विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता।

निष्पक्ष, वैध और न्यायसंगत प्रक्रिया अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर निर्णय केवल ऐसी प्रक्रिया के बाद ही लिया जा सकता है जो निष्पक्ष (Fair), वैध (Lawful) और न्यायसंगत (Reasonable) हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि विदेशी अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) की धारा 9 के तहत नागरिकता साबित करने का भार (Burden of Proof) अब भी संबंधित व्यक्ति पर ही रहेगा। इस कानूनी प्रावधान में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि नागरिकों को अपनी नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी स्वयं उठानी होगी, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें उचित अवसर मिले।

दोबारा सुनवाई का मतलब राहत नहीं

बेंच ने यह भी साफ किया कि मामलों को वापस भेजने का अर्थ यह नहीं है कि अपीलकर्ताओं को कोई विशेष राहत या कानूनी लाभ दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "मामलों को वापस भेजने का उद्देश्य किसी ऐसे व्यक्ति को लाभ पहुंचाना नहीं है जो अपनी नागरिकता साबित करने में असफल रहता है। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर परिणाम विदेशी अधिनियम, 1946, विदेशी (न्यायाधिकरण) आदेश, 1964 तथा संविधान द्वारा निर्धारित निष्पक्ष प्रक्रिया के अनुरूप ही हो।" यह अदालत का स्पष्ट संदेश है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए ही निर्णय लिए जाने चाहिए।

हाई कोर्ट और ट्रिब्यूनल के सभी आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने गौहाटी हाई कोर्ट के फैसलों के साथ-साथ संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों द्वारा पारित सभी आदेशों को भी रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया, "संबंधित विदेशी न्यायाधिकरण इन मामलों की नए सिरे से सुनवाई करेंगे और पहले दिए गए हाई कोर्ट या न्यायाधिकरण के किसी भी अवलोकन से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से फैसला करेंगे।" यह आदेश यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय के समक्ष पेश किए गए मुद्दों पर निष्पक्षता से विचार किया जाएगा।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला उन 27 लोगों से जुड़ा है जिन्हें विदेशी न्यायाधिकरण ने एकतरफा (Ex Parte) आदेश के जरिए विदेशी घोषित कर दिया था। इन लोगों ने इस आदेश को गोहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हाई कोर्ट ने कहा था कि:

  • संबंधित लोगों को विधिवत नोटिस भेजे गए थे।
  • इसके बावजूद वे न्यायाधिकरण के सामने पेश नहीं हुए।
  • विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले को लगभग 23 वर्ष बाद चुनौती दी गई।
  • किसी भी याचिकाकर्ता ने लिखित जवाब, दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।

इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने माना था कि विदेशी न्यायाधिकरण के पास उन्हें विदेशी घोषित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। यह स्थिति नागरिकों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि कोई व्यक्ति कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं करता है, तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।

हाई कोर्ट ने धारा 9 का दिया था हवाला

गोहाटी हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 का उल्लेख करते हुए कहा था कि भारतीय नागरिक होने का प्रमाण देने की पूरी जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है, क्योंकि उससे जुड़े तथ्य उसी के विशेष ज्ञान में होते हैं। हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि मामला एकतरफा चल रहा हो, तब भी प्रमाण प्रस्तुत करने का दायित्व संबंधित व्यक्ति पर ही रहता है। यदि वह कोई साक्ष्य पेश नहीं करता तो विदेशी न्यायाधिकरण उसके खिलाफ उपलब्ध संदर्भ (Reference) के आधार पर उसे विदेशी घोषित कर सकता है।

साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी माना था कि विदेशी अधिनियम के तहत कार्यवाही केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं हो सकती और संबंधित व्यक्ति को भारतीय नागरिकता साबित करने का उचित अवसर मिलना चाहिए। लेकिन अदालत ने कहा था कि यह अवसर अनंतकाल तक नहीं दिया जा सकता, विशेषकर तब जब कई अवसर दिए जाने के बावजूद उनका उपयोग न किया जाए। यह स्थिति उन लोगों के लिए चिंताजनक है जो अपनी नागरिकता को साबित करने में असमर्थ हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विशेष रूप से असम में विदेशी नागरिकों की पहचान से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने एक ओर जहां यह स्पष्ट किया कि नागरिकता साबित करने का कानूनी दायित्व संबंधित व्यक्ति पर ही रहेगा, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित किया कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने जैसा गंभीर निर्णय केवल निष्पक्ष, पारदर्शी और संविधानसम्मत प्रक्रिया के बाद ही लिया जा सकता है। अब इन सभी 27 मामलों की सुनवाई संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों में नए सिरे से होगी और वे स्वतंत्र रूप से उपलब्ध साक्ष्यों तथा कानून के आधार पर फैसला करेंगे।

यह निर्णय न केवल उन व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपनी नागरिकता के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक उदाहरण स्थापित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता कितनी महत्वपूर्ण है। यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कितनी गंभीरता से कार्य करती है।

असम में नागरिकता का मुद्दा एक जटिल और संवेदनशील विषय है, जिसमें ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक कारक शामिल हैं। राज्य में कई दशकों से अवैध प्रवासियों की समस्या बनी हुई है, जो स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो नागरिकता के मामलों में निष्पक्षता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।

इस फैसले के बाद, यह उम्मीद की जा रही है कि संबंधित न्यायाधिकरण नागरिकता के मामलों में अधिक सावधानी बरतेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी प्रक्रियाएं संविधान और कानून के अनुसार हों। यह निर्णय न केवल न्यायिक प्रक्रिया में सुधार लाने में मदद करेगा, बल्कि यह उन व्यक्तियों के लिए भी राहत का स्रोत बनेगा जो अपनी नागरिकता को लेकर चिंतित हैं।

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