पंजाब कांग्रेस में हाईकमान की चेतावनी के बाद बागी गुट बैकफुट पर

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 16, 2026, 05:20 AM IST
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दिल्ली में हाईकमान की बैठक के बाद पंजाब कांग्रेस का बागी गुट बैकफुट पर आ गया है। चन्नी ने कहा- हम पार्टी के साथ हैं, जबकि राहुल गांधी ने दूरी बना ली है।

दिल्ली में हाईकमान के साथ हाल ही में हुई मुलाकात के बाद पंजाब कांग्रेस का बागी गुट बैकफुट पर आ गया है। पार्टी के अंदर चल रही अस्थिरता और बगावत की स्थिति को देखते हुए, हाईकमान ने बागी गुट को स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने बगावत जारी रखी, तो उन पर कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर राजा वड़िंग ही बने रहेंगे। यह स्थिति पंजाब कांग्रेस के लिए एक नई चुनौती उत्पन्न कर रही है, खासकर जब विधानसभा चुनावों में केवल कुछ महीने ही बचे हैं।

इस चेतावनी के बाद बागी गुट के सुर बदल गए हैं। लगभग तीन घंटे की बैठक के बाद, विधायक राणा गुरजीत ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनकी पार्टी के भीतर कोई लड़ाई नहीं है और वे अंदर की बात बाहर नहीं लाएंगे। उनका यह बयान बागी गुट की स्थिति को दर्शाता है, जो अब पार्टी के साथ एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रहा है। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि बागी गुट अब हाईकमान के प्रति अधिक समर्पित होने का प्रयास कर रहा है।

बागी गुट के मुखिया चरणजीत सिंह चन्नी ने भी बैठक के बाद कहा कि उन्हें हाईकमान द्वारा बुलाया गया था और उन्होंने अपनी बात रखी। चन्नी ने यह भी कहा कि यह स्पष्ट है कि वे पार्टी के साथ हैं और राहुल गांधी तथा मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ सहयोग करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका यह बयान पार्टी के भीतर एकता की आवश्यकता को रेखांकित करता है, विशेषकर जब पार्टी चुनावी तैयारी में जुटी हुई है। चन्नी ने कहा कि वे पार्टी के खिलाफ नहीं हैं और अंत में उन्होंने कहा- "ऑल इज वेल।"

पंजाब में आयोजित बैठक का उद्देश्य पार्टी के भीतर की स्थिति को सुधारना था। बैठक में परगट सिंह और सुखजिंदर सिंह रंधावा भी उपस्थित थे। हालांकि, इस बैठक के परिणाम अभी स्पष्ट नहीं हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि पंजाब कांग्रेस के बागी गुट की हाईकमान के साथ यह पहली मीटिंग थी। इससे पहले, चन्नी और रंधावा ने रणदीप सुरजेवाला से उनके निवास पर मुलाकात की थी, जिसका उद्देश्य पार्टी में चल रहे अंतर्विरोधों को सुलझाना था।

वहीं, राहुल गांधी ने पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल को दिल्ली से छत्तीसगढ़ लौटाया और चन्नी गुट से दूरी बना ली। राहुल गांधी चरणजीत चन्नी की प्रेशर टेक्टिस से बेहद खफा हैं। इस कारण, उन्होंने चन्नी को अभी तक मिलने का वक्त नहीं दिया। यह स्थिति पार्टी में तनाव को बढ़ा सकती है, खासकर जब चुनाव नजदीक हैं।

राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया था कि उनकी मांगों पर विचार नहीं किया जाएगा। यह संकेत है कि हाईकमान बागी गुट के प्रति कोई नरमी नहीं दिखाने वाला है। राहुल गांधी अब अगले एक-दो दिनों में पंजाब कांग्रेस पर अहम फैसला सुनाकर चन्नी गुट को झटका दे सकते हैं। इस संभावित निर्णय से पार्टी में और भी अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।

उधर, पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राजा वड़िंग ने ग्राउंड लेवल पर कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंगों का दौर शुरू कर दिया है। यह कदम पार्टी के भीतर एकता स्थापित करने के लिए आवश्यक है, क्योंकि पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच विश्वास को पुनर्स्थापित करना आवश्यक है।

चन्नी से राहुल की नाराजगी के 4 बड़े कारण

  1. हाईकमान के फैसले को नकारना: कांग्रेस हाईकमान ने चुनाव के लिए जो कमेटियां घोषित की थीं, उनकी मंजूरी राहुल गांधी ने दी थी। चन्नी व उनके खेमे ने हाईकमान की लिस्ट को नकार दिया और कहा कि वे इस लिस्ट को नहीं मानते। यहां तक कि वे भूपेश बघेल की मीटिंग में भी शामिल नहीं हुए। राहुल गांधी इस बात से नाराज हैं कि चन्नी ने हाईकमान के फैसले को नकारा है।
  2. हाईकमान से बात करने की जिद: चन्नी व उनके गुट ने पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल के साथ बातचीत करने से साफ इनकार कर दिया। चन्नी गुट हाईकमान से बात करने की जिद पर अड़ा रहा। चन्नी ने एक ओर हाईकमान के फैसले को नकारा, दूसरी ओर हाईकमान से मिलने की बात की। चन्नी गुट के अड़ियल रवैये से राहुल गांधी नाराज हैं। सूत्र बताते हैं कि इसी वजह से राहुल गांधी चन्नी को मिलने का समय भी नहीं दे रहे हैं।
  3. प्रदेश अध्यक्ष की खिलाफत: चन्नी व उनके गुट ने स्पष्ट कर दिया कि वे राजा वड़िंग की अध्यक्षता में चुनाव में नहीं जाएंगे। राजा वड़िंग की अध्यक्षता को जारी रखने का फैसला हाईकमान का है। इसके बावजूद चन्नी गुट ने राजा वड़िंग के खिलाफ मोर्चा खोला है। राहुल गांधी इसे सीधे तौर पर पार्टी में अनुशासनहीनता मान रहे हैं।
  4. चन्नी की प्रेशर टेक्टिस: पंजाब मामले को लेकर दिल्ली में केसी वेणुगोपाल ने छत्तीसगढ़ से भूपेश बघेल और पंजाब से प्रताप सिंह बाजवा को दिल्ली बुलाया। वेणुगोपाल ने दोनों नेताओं के साथ मीटिंग की। इधर, चन्नी गुट ने राहुल गांधी के विदेश से लौटते ही सारा पंजाब चन्नी दे नाल मुहिम शुरू कर सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना शुरू कर दिया। कांग्रेस हाईकमान इसे प्रेशर टेक्टिस का हिस्सा मान रहा है और इसी वजह से शीर्ष नेतृत्व चन्नी खेमे से नाराज है। भूपेश बघेल ने भी अपनी रिपोर्ट में यही बात कही है कि जब पंजाब में वे मीटिंग कर रहे थे, तो चन्नी खेमा उनके पेरेलल अपनी मीटिंग्स कर रहा था।

विधानसभा चुनाव से करीब सात महीने पहले पंजाब कांग्रेस में मचे घमासान को लेकर हाईकमान में भी मतभेद हो गए हैं। कांग्रेस स्रोतों के अनुसार, इस मामले में राहुल गांधी की टीम और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की अलग-अलग राय है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल व पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल नहीं चाहते थे कि राजा वड़िंग को अध्यक्ष की कुर्सी से हटाया जाए। इस स्थिति का गहरा असर पार्टी की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है, क्योंकि यदि पार्टी के भीतर अस्थिरता बनी रहती है, तो यह चुनाव में उसके प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है।

पंजाब कांग्रेस के लिए यह समय बहुत महत्वपूर्ण है। पार्टी को एकजुट रहने की आवश्यकता है, ताकि वह आगामी विधानसभा चुनावों में प्रभावी रूप से प्रतिस्पर्धा कर सके। यदि बागी गुट और हाईकमान के बीच मतभेद जारी रहते हैं, तो यह पार्टी के चुनावी प्रदर्शन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

इस संदर्भ में, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या हाईकमान अपने फैसले पर कायम रहता है या बागी गुट की मांगों पर विचार करेगा। पंजाब की राजनीतिक स्थिति में स्थिरता लाने के लिए जरूरी है कि सभी पक्ष एक साथ आएं और पार्टी के भीतर की अनियमितताओं को दूर करें।

इसके अलावा, यह भी महत्वपूर्ण है कि पंजाब कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बनाए रखे, ताकि वे चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल हो सकें। यदि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को सही दिशा में मार्गदर्शन नहीं कर पाती, तो यह चुनावी परिदृश्य में उसकी स्थिति को कमजोर कर सकता है।

कुल मिलाकर, पंजाब कांग्रेस के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है। पार्टी को अपने भीतर की अस्थिरता को दूर करने और एकजुटता की भावना को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो चुनावी मुकाबले में उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।

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