डीएमके ने कांग्रेस से नाता तोड़ा, स्टालिन ने सांसदों को दिए निर्देश

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 17, 2026, 11:22 AM IST
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डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने पार्टी सांसदों को कांग्रेस से दूरी बनाने के निर्देश दिए हैं। परिसीमन बिल और कावेरी जल विवाद पर भी सख्त रुख अपनाया गया है।

डीएमके ने कांग्रेस से नाता तोड़ा: द्रमुक (DMK) प्रमुख और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने गुरुवार को लंदन से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पार्टी के सभी सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में कई प्रस्ताव पारित किए गए, जिसमें सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम डीएमके और कांग्रेस के बीच संबंधों को लेकर सामने आया है। स्टालिन ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस के साथ डीएमके का रिश्ता अब खत्म हो चुका है।

कांग्रेस से मोहभंग, स्टालिन की दो टूक
बैठक के दौरान एमके स्टालिन ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने पार्टी के भीतर चर्चा करते हुए कांग्रेस की 'दोहरी नीति' का जिक्र किया। स्टालिन ने कहा कि कांग्रेस ने उन सीटों पर जीत हासिल की जो डीएमके की मदद से मिली थीं, लेकिन सत्ता के लालच में उन्होंने डीएमके को धोखा दिया। यह स्थिति भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ का प्रतिनिधित्व करती है, खासकर तमिलनाडु में, जहां डीएमके और कांग्रेस के बीच का संबंध एक लंबे समय तक महत्वपूर्ण गठबंधन रहा है।

कांग्रेस के साथ संबंधों का टूटना, डीएमके के लिए एक नई राजनीतिक रणनीति की ओर इशारा करता है। स्टालिन ने अपने सभी सांसदों को सख्त निर्देश दिए कि वे अब कांग्रेस पार्टी से पूरी तरह दूरी बनाए रखें। यह निर्णय केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि डीएमके अपनी स्वतंत्र पहचान को स्थापित करने के लिए कितनी गंभीर है।

परिसीमन बिल पर DMK का सख्त रुख
बैठक में 'परिसीमन विधेयक' (Delimitation Bill) को लेकर भी चर्चा हुई। परिसीमन विधेयक का उद्देश्य चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को निर्धारित करना है, जो जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। इस विधेयक का प्रभाव विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां जनसंख्या में बदलाव हुआ है। डीएमके ने स्पष्ट किया है कि वह वर्तमान स्वरूप में इस बिल का विरोध जारी रखेगी, क्योंकि यह जनसंख्या पर आधारित है और महिला आरक्षण से जुड़ा हुआ है।

इस विधेयक का विरोध करने के पीछे के कारणों में यह भी शामिल है कि कई दलों का मानना है कि परिसीमन के परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। डीएमके ने कहा है कि वे भविष्य में आने वाले नए बिल का इंतजार करेंगे और उसके बाद ही कोई निर्णय लेंगे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पार्टी किसी भी प्रकार की राजनीतिक रणनीति के लिए तैयार है।

कावेरी जल विवाद और मेकेदातू बांध का मुद्दा
डीएमके ने केंद्र सरकार से मेकेदातू बांध विवाद को सुलझाने के लिए एक ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की है। कावेरी जल विवाद एक लंबे समय से चल रहा मुद्दा है, जिसमें तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच जल वितरण को लेकर विवाद है। यह विवाद कई दशकों से चला आ रहा है और इससे संबंधित मुद्दों ने हमेशा राजनीतिक गर्मागर्मी को बढ़ाया है। पार्टी ने कर्नाटक सरकार पर तमिलनाडु के हक का कावेरी जल छोड़ने से इनकार करने का आरोप लगाया।

कावेरी जल विवाद केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह मुद्दा किसानों की आजीविका और जल संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ा है। प्रस्ताव में कहा गया है कि कर्नाटक सरकार के रवैये के कारण मेट्टूर बांध खोलने में देरी हुई, जिससे राज्य के किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है।

संसद में गूंजेगी तमिलनाडु की आवाज
एमके स्टालिन ने सोशल मीडिया पर संदेश देते हुए कहा कि डीएमके का प्रत्येक सांसद तमिलनाडु के लोगों की 'आवाज और जमीर' बनकर काम करेगा। इस संदर्भ में, यह महत्वपूर्ण है कि पार्टी ने संसद के मॉनसून सत्र में राज्य के अधिकारों, संघवाद (federalism) और संवैधानिक मूल्यों के मुद्दों को मजबूती से उठाने का संकल्प लिया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि डीएमके केंद्र सरकार के साथ अपने संबंधों को लेकर कितनी गंभीर है।

स्टालिन ने सांसदों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे केंद्र के हर कदम पर पैनी नजर रखें और तमिलनाडु के हितों से जुड़े मामलों पर कोई समझौता न करें। यह स्थिति केंद्र-राज्य संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देती है, जहां राज्य सरकारें अपने अधिकारों के लिए अधिक सजग और सक्रिय हो रही हैं।

डीएमके की यह बैठक और उसके परिणाम भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देते हैं। कांग्रेस के साथ संबंधों का टूटना, डीएमके के लिए एक नई राजनीतिक रणनीति की ओर इशारा करता है। यह स्पष्ट है कि स्टालिन अब अपनी पार्टी को एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान देने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

कांग्रेस और डीएमके के बीच के संबंधों का इतिहास काफी पुराना है। दोनों पार्टियों ने मिलकर कई चुनावों में सफलता प्राप्त की है। लेकिन हाल के वर्षों में, विभिन्न मुद्दों पर मतभेद बढ़ते गए थे, जो अब इस स्थिति में परिणत हो गए हैं। डीएमके का यह कदम कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है, क्योंकि यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी था।

कुल मिलाकर, यह राजनीतिक घटनाक्रम तमिलनाडु की राजनीति में एक नई दिशा का संकेत देता है। स्टालिन की यह घोषणा न केवल उनकी पार्टी के लिए, बल्कि पूरे राज्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में ये घटनाक्रम किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और इसका प्रभाव तमिलनाडु की राजनीति पर कैसे पड़ता है।

इस स्थिति का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि डीएमके का यह निर्णय उन मतदाताओं पर भी प्रभाव डाल सकता है, जो कांग्रेस और डीएमके दोनों के समर्थक रहे हैं। यह संभव है कि यह निर्णय उन लोगों के बीच असंतोष पैदा कर सकता है, जो दोनों पार्टियों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण मानते थे। इसके अलावा, यह भी देखना होगा कि अन्य राजनीतिक दल इस स्थिति का कैसे लाभ उठाते हैं।

अंततः, स्टालिन का यह कदम न केवल डीएमके के भविष्य के लिए, बल्कि पूरे तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में, डीएमके और कांग्रेस के बीच संबंधों का टूटना, राज्य की राजनीति में नई चुनौतियों और अवसरों को जन्म देगा।

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