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बंगाल राज्यसभा उपचुनाव में तीनों सीटों पर बीजेपी ने उतारे टीएमसी के दलबदलू उम्मीदवार

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 10, 2026, 07:01 AM IST
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बीजेपी राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत पाने की कोशिश में है। टीएमसी नेताओं को शामिल नहीं करने की बात कहने वाले बीजेपी बंगाल अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि भ्रष्टाचार, ज़ुल्म, नौकरी बिक्री से दूर रहे लोगों का TMC के ख़िलाफ़ लड़ाई में हमेशा स्वागत था।

बीजेपी ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में राज्यसभा के उपचुनाव के लिए सभी तीन सीटों पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के दलबदलू नेताओं को उम्मीदवार बनाया है। यह निर्णय बीजेपी द्वारा गुरुवार रात को जारी की गई सूची में स्पष्ट हुआ। जिन नेताओं को बीजेपी ने उम्मीदवार बनाया है, उनमें सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक शामिल हैं। इन तीनों नेताओं ने हाल ही में टीएमसी से इस्तीफा दिया था और बीजेपी में शामिल होने के कुछ घंटों बाद ही उन्हें राज्यसभा के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया गया।

इन नेताओं के इस्तीफे की पृष्ठभूमि में टीएमसी में चल रही आंतरिक बगावत का मामला है। जब पार्टी में असंतोष बढ़ा, तब इन तीनों नेताओं ने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया। इसके बाद, 24 जुलाई को इन तीन सीटों पर उपचुनाव कराए जाने की घोषणा की गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन तीनों नेताओं की जीत सुनिश्चित है, क्योंकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के पास अब इन सीटों को जीतने की क्षमता नहीं है। इसके अतिरिक्त, टीएमसी का बागी खेमा भी इस बार कोई उम्मीदवार नहीं उतार रहा है, जिससे बीजेपी को एक बड़ी राजनीतिक बढ़त मिल सकती है।

हालांकि, यह सवाल उठता है कि जब सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक पहले भी राज्यसभा के सांसद थे और अब फिर से सांसद बनने जा रहे हैं, तो उन्होंने टीएमसी से इस्तीफा क्यों दिया? इस परिवर्तन का मुख्य कारण यह हो सकता है कि बीजेपी का यह कदम एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) को संसद में दो-तिहाई बहुमत दिलाने की एक रणनीति का हिस्सा है।

राज्यसभा में मजबूत होगी NDA की स्थिति

यदि बीजेपी इन तीन सीटों पर जीत हासिल करती है, तो एनडीए की राज्यसभा में कुल संख्या 154 तक पहुंच सकती है। वर्तमान में, बीजेपी के पास राज्यसभा में 114 सांसद हैं, जबकि सामान्य बहुमत के लिए 123 सांसदों की आवश्यकता होती है। एनडीए के कुल 151 सदस्य हैं, जिनमें मनोनीत और निर्दलीय सदस्य भी शामिल हैं। तीन नई सीटें मिलने के बाद एनडीए को दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े 163 से केवल 9 सीटें दूर रह जाएगा। इसके चलते, बीजेपी की योजना है कि वह किसी भी गठबंधन में शामिल नहीं होने वाले विपक्षी दलों को समर्थन देने के लिए राजी कर सकती है।

विपक्षी INDIA गठबंधन की संख्या इस समय घटकर 64 सांसदों तक पहुंच गई है। इसके अलावा, 27 सांसद ऐसे हैं जो किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, जिसमें प्रमुख रूप से डीएमके के 8 सांसद, बीजेडी के 5 सांसद और आम आदमी पार्टी के 3 सांसद शामिल हैं। इनमें से अधिकांश सदस्य विभिन्न मुद्दों पर बीजेपी का विरोध करते रहे हैं, जिससे बीजेपी को अपनी स्थिति मजबूत करने का एक और अवसर मिल सकता है।

बीजेपी को दो-तिहाई बहुमत क्यों चाहिए?

बीजेपी की मुख्य प्राथमिकता राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करना है, ताकि वह संवैधानिक संशोधन बिल पास करा सके। सरकार की योजना है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्रीय तथा राज्य मंत्री 30 दिनों से अधिक समय तक जेल में रहते हैं, तो उन्हें अपने पद से स्वतः हटा दिया जाएगा। इस प्रकार के विधेयकों को पारित कराने के लिए बीजेपी को दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है।

संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, संवैधानिक संशोधन के लिए दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वालों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। साधारण बिलों के लिए सामान्य बहुमत पर्याप्त होता है, लेकिन संवैधानिक संशोधनों के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

बीजेपी में शामिल हुए तीनों दलबदलू नेता

कोलकाता के साल्ट लेक स्थित बीजेपी के प्रदेश कार्यालय में, पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने टीएमसी से आए तीनों नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई। सदस्यता ग्रहण करने के तुरंत बाद, बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार बना दिया।

TMC नेताओं के लिए तो दरवाजे बंद थे?

जब समीक भट्टाचार्य से पूछा गया कि पार्टी पहले कहती थी कि टीएमसी नेताओं के लिए बीजेपी के दरवाजे बंद हैं, तो अब उन्हें क्यों शामिल किया गया, तो उन्होंने इसे एक 'एक्सेप्शनल केस' बताया। उन्होंने कहा कि बीजेपी का रुख आज भी वही है, लेकिन ऐसे नेता जिन्होंने भ्रष्टाचार नहीं किया और जनता के अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया, उनका बीजेपी में स्वागत है। भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि इन तीन नेताओं का अनुभव पश्चिम बंगाल में बीजेपी को मजबूत करेगा।

सुष्मिता देव के टीएमसी पर गंभीर आरोप

बीजेपी में शामिल होने के बाद, सुष्मिता देव ने अपनी पूर्व पार्टी टीएमसी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि टीएमसी में शामिल होने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि भ्रष्टाचार किस स्तर तक हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आलोचना करने वाले बहुत लोग हो सकते हैं, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि उनका कभी भी भ्रष्टाचार से कोई संबंध रहा है। सुष्मिता देव ने कहा कि बीजेपी नेतृत्व के निर्णय के अनुसार ही उन्होंने कोलकाता में पार्टी की सदस्यता ली।

सुष्मिता देव का राजनीतिक सफर असम से शुरू हुआ था। उन्होंने कहा कि वे चाहतीं तो घर बैठे ऑनलाइन भी बीजेपी की सदस्य बन सकती थीं, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उन्हें कोलकाता आकर सदस्यता लेने के लिए कहा। उन्होंने यह भी बताया कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने उन्हें सलाह दी कि पश्चिम बंगाल की जनता का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने उन्हें दो बार राज्यसभा भेजा था।

पूर्व राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने भी टीएमसी नेतृत्व की आलोचना की। वहीं, समीक भट्टाचार्य ने कहा कि अब इन नेताओं की पुरानी राजनीतिक पहचान मायने नहीं रखती। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति का एक राजनीतिक अतीत होता है, लेकिन आज इनकी पहचान सिर्फ बीजेपी कार्यकर्ता की है।

सुष्मिता देव: कांग्रेस से BJP तक का सफर

सुष्मिता देव पहले कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं। उन्होंने वर्ष 2021 में कांग्रेस छोड़कर टीएमसी का दामन थामा था। अब करीब पांच साल बाद उन्होंने टीएमसी भी छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गई हैं। इस प्रकार, उनका राजनीतिक सफर एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है।

बंगाल की राजनीति में बढ़ेगी हलचल

इन नेताओं के बीजेपी में शामिल होने और तुरंत राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। इससे एक ओर टीएमसी को झटका लगा है, वहीं बीजेपी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह आगामी राजनीतिक मुकाबलों से पहले अपने संगठन और संसदीय ताकत को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।

इस घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में दलबदल की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यह न केवल बीजेपी की रणनीति का हिस्सा है, बल्कि यह टीएमसी के भीतर असंतोष और विद्रोह की स्थिति को भी दर्शाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के दलबदल से राजनीतिक स्थिरता पर प्रभाव पड़ सकता है और यह आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इसके अलावा, इस स्थिति से यह भी संकेत मिलता है कि टीएमसी के भीतर नेतृत्व के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है, जो पार्टी के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है। बीजेपी द्वारा दलबदलुओं को अपने पक्ष में लाना और उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करना, एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसका उद्देश्य पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करना है।

इस प्रकार, यह उपचुनाव केवल तीन सीटों के लिए नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक हो सकता है।

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