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रायसेन में तालिबानी सजा, चोरी के शक में युवकों को खंभे से बांधकर दिए बिजली के झटके, वीडियो वायरल होने पर NHRC ने लिया संज्ञान

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 11, 2026, 11:51 PM IST
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मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में चोरी के शक में दो युवकों को खंभे से बांधकर बिजली के झटके दिए गए। घटना का वीडियो वायरल होने पर NHRC ने संज्ञान लिया है।

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायसेन। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के करमोदिया गांव में हाल ही में एक अत्यंत गंभीर और निंदनीय घटना सामने आई है, जिसमें दो युवकों को चोरी के संदेह में ग्रामीणों द्वारा बर्बरता का शिकार बनाया गया। आरोप है कि उन्हें खंभे से बांधकर बिजली के झटके दिए गए। यह मामला तब प्रकाश में आया जब घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस वीडियो के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने भी इस मामले का संज्ञान लिया है, जो कि मानवाधिकारों के उल्लंघन के संबंध में गंभीर चिंता का विषय है।

मध्य प्रदेश में इस तरह की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन इस विशेष मामले ने समाज में एक बार फिर से कानून व्यवस्था और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को उठाया है। समाज में न्याय की मांग करने के बजाय, कुछ लोग अपने हाथों में कानून को लेने की कोशिश करते हैं, जो कि न केवल अवैध है, बल्कि बेहद खतरनाक भी है।

गांव के कुछ युवकों ने उन्हें पकड़ लिया

रायसेन कोतवाली थाना प्रभारी नरेंद्र गोयल ने बताया कि वायरल वीडियो चार जुलाई का है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि पिपलई निवासी धनराज बैरागी और हेमराज बैरागी, जिन पर आरोप है कि वे जितेंद्र ठाकुर के खेत से पानी की मोटर चोरी करने का प्रयास कर रहे थे, को गांव के कुछ युवकों ने पकड़ लिया। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि ग्रामीणों में चोरी के प्रति गहरा आक्रोश था, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि इस तरह की बर्बरता किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।

पुलिस के अनुसार, उसी दिन ग्रामीणों ने दोनों आरोपितों को पुलिस के हवाले कर दिया था। न्यायालय में पेश करने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। यह जानकारी भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस का कहना है कि करंट लगाने की घटना भी संभवतः उसी दिन की है, जबकि वीडियो शनिवार को सामने आया। यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस ने समय पर कार्रवाई की थी या ग्रामीणों के हाथों में कानून को सौंपने की अनुमति दी थी।

वायरल वीडियो में कुछ लोग दोनों युवकों को खंभे से बांधकर यातना देते दिखाई दे रहे हैं। उनसे चोरी स्वीकार करने और घटना में शामिल अन्य लोगों के नाम बताने का दबाव भी बनाया जा रहा है। यह दृश्य न केवल मानवता के खिलाफ है बल्कि यह दर्शाता है कि कुछ लोग किस हद तक जा सकते हैं जब वे अपने आप को न्याय का ठेकेदार मान लेते हैं।

शरिया या तालिबानी कानून नहीं चलेगा

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि चोरी के आरोप में युवकों को करंट लगाने की तालिबानी सजा देने का मामला गंभीर है। उन्होंने कहा कि आयोग ने घटना का संज्ञान लेकर आवश्यक निर्देश दिए हैं। उन्होंने लिखा कि "यह भारत है, यहां शरिया या तालिबानी कानून नहीं चलेगा।" इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि मानवाधिकार आयोग इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से लेता है और इसके खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है।

इस घटना के बाद, समाज में कई सवाल उठ रहे हैं। क्या यह घटना सिर्फ एक स्थानीय समस्या है, या यह एक व्यापक सामाजिक मुद्दा है? क्या ग्रामीणों के बीच कानून को अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है? और क्या इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार और पुलिस को अधिक सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है?

यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस तरह की घटनाएं केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मानवाधिकारों के उल्लंघन का संकेत देती हैं। जब लोग अपने आप को न्याय का ठेकेदार मान लेते हैं, तो यह समाज में अराजकता और असुरक्षा का माहौल बनाता है।

इस घटना के पीछे की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज में, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, पारंपरिक न्याय प्रणाली और सामुदायिक निर्णय लेने की प्रवृत्तियां अक्सर देखने को मिलती हैं। कई बार, ग्रामीण लोग अपनी समस्याओं का समाधान खुद खोजने की कोशिश करते हैं, जो कि कानून के दायरे से बाहर होता है। यह प्रवृत्ति न केवल कानून के शासन को कमजोर करती है, बल्कि समाज में हिंसा और अन्याय को भी बढ़ावा देती है।

इस घटना के बाद, यह आवश्यक हो जाता है कि समाज में जागरूकता बढ़ाई जाए और लोगों को यह समझाया जाए कि कानून को अपने हाथ में लेना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। इसके बजाय, लोगों को पुलिस और न्यायालय प्रणाली पर भरोसा करना चाहिए, जो कि कानून के अनुसार न्याय प्रदान करने के लिए स्थापित की गई है।

संक्षेप में, रायसेन में हुई इस घटना ने एक बार फिर से यह स्पष्ट कर दिया है कि समाज में कानून और मानवाधिकारों का उल्लंघन एक गंभीर समस्या है, जिसे सुलझाने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा। यह घटना न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि पूरे देश में मानवाधिकारों की स्थिति पर भी सवाल उठाती है।

आगे बढ़ते हुए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार और संबंधित संस्थाएं इस मामले में सक्रियता दिखाएंगी और क्या इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँगे। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में भी होती रहेंगी, जिससे समाज में अराजकता और असुरक्षा का माहौल बनेगा।

अंत में, यह भी आवश्यक है कि मीडिया और समाज के अन्य हिस्से इस मुद्दे पर चर्चा करें और जागरूकता फैलाएं ताकि लोग समझ सकें कि कानून का पालन करना और मानवाधिकारों का सम्मान करना सभी की जिम्मेदारी है।

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