जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 21वें दिन भूख हड़ताल में अपनी स्वास्थ्य स्थिति साझा की, जिसमें उन्होंने कहा कि उनका 20 फ़ीसदी शरीर ख़त्म हो चुका है।
नई दिल्ली, भारत 18 जुल॰ 2026 ALN: दिल्ली के जंतर-मंतर पर जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल शनिवार (18 जुलाई) को 21वें दिन में प्रवेश कर गई।
वांगचुक 28 जून से अनशन पर हैं। इस बीच उन्होंने शुक्रवार देर रात सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी कर अपनी स्वास्थ्य स्थिति और आंदोलन को लेकर बात की।
वीडियो संदेश में वांगचुक ने कहा कि अनशन के दौरान उनके शरीर का क़रीब 20 फ़ीसदी हिस्सा ख़त्म हो चुका है, लेकिन उनका दिमाग़ अब भी पूरी तरह से काम कर रहा है।
उन्होंने कहा, "मैं अभी भी ज़िंदा हूं. मेरे शरीर का लगभग 20 फ़ीसदी हिस्सा चला गया है। शरीर के फ़ैट्स के बाद अब मसल्स (मांसपेशियां) भी जा चुके हैं। इसके बाद अंदरूनी ऑर्गन जाएंगे और आख़िर में दिमाग़। लेकिन अभी वो नौबत नहीं आई है। आज 20वां दिन ख़त्म हो रहा है और मैं साबित कर सकता हूं कि मेरा दिमाग़ बिल्कुल ठीक काम कर रहा है।"
वांगचुक का यह अनशन इस बात का प्रतीक है कि वे शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन केवल व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं, बल्कि पूरे छात्र समुदाय के भविष्य के लिए है। उनका कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में हो रही गड़बड़ियों के कारण छात्रों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
"यहां बहुत से लोग पूछते हैं कि आंदोलन की वजह से क्या केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा होगा या कोई जवाबदेही तय होगी? मैं आपसे पूछता हूं, भारत की जनता को अपने बच्चों की जान और शिक्षा ज़्यादा प्यारी है या प्याज़? भारत में जनता के आंदोलन की ताक़त से तीन बार सरकारें गिरी हैं। 1980 में केंद्र सरकार गिरी, 1998 में दिल्ली और राजस्थान की सरकारें गिरीं, वो आंदोलन सिर्फ़ प्याज़ की क़ीमतों को लेकर था।"
सोनम वांगचुक ने यह भी कहा कि इस बार मुद्दा प्याज़ नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य और जीवन का है। उन्होंने दावा किया कि इस साल नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के कारण 20 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की है। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह शिक्षा प्रणाली में गहरी खामियों को भी उजागर करती है। उन्होंने सवाल किया कि क्या इस मुद्दे पर भी शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा नहीं होना चाहिए।
उनका यह अनशन न केवल छात्रों के जीवन को बचाने की मांग कर रहा है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की जवाबदेही तय करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। वांगचुक ने कहा, "20 जुलाई को मेरे साथ संसद की ओर मार्च कीजिए। हमारी असली ताक़त आपकी संख्या है। मैं अकेला, भूखा और एक साधारण इंसान हूं। ताक़त आप लोगों की है। हम सिर्फ़ छात्रों के लिए जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।"
वांगचुक के अनशन के कारण उनकी सेहत पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा है। जब वे कहते हैं कि उनके शरीर का 20 फ़ीसदी हिस्सा ख़त्म हो चुका है, तो यह चिंता का विषय है। भूख हड़ताल के दौरान शरीर में ऊर्जा के लिए प्राकृतिक रूप से मांसपेशियों और वसा का उपयोग किया जाता है, जिससे शरीर कमजोर होता है। हालांकि, वांगचुक का कहना है कि उनका मानसिक स्वास्थ्य अभी भी स्थिर है, जो एक सकारात्मक संकेत है।
इस बीच, आंदोलन के दौरान वांगचुक को समर्थन देने वाले कई लोग जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए हैं। उन्होंने वांगचुक के साथ एकजुटता दिखाई और उनकी मांगों को समर्थन दिया। यह आंदोलन केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि छात्रों और उनके परिवारों की एक सामूहिक आवाज़ का प्रतीक बन गया है।
वांगचुक के आंदोलन ने विभिन्न संगठनों और छात्रों के समूहों का ध्यान आकर्षित किया है। कई छात्र संगठनों ने भी इस अनशन का समर्थन किया है और शिक्षा में सुधार की मांग को लेकर आगे आए हैं। इस प्रकार, यह आंदोलन केवल एक भूख हड़ताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का हिस्सा बनता जा रहा है।
वांगचुक ने यह भी उल्लेख किया कि उनके अनशन के दौरान कुछ लोगों ने उन पर हमला करने की कोशिश की। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने दावा किया कि वांगचुक की ओर कोई वस्तु फेंकी गई, हालांकि इस घटना में उन्हें कोई चोट नहीं लगी। यह घटना इस बात का संकेत है कि वांगचुक का आंदोलन कितना संवेदनशील और विवादास्पद बन गया है।
इस प्रकार, सोनम वांगचुक का अनशन केवल एक व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है, बल्कि यह शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को उजागर करने वाला एक महत्वपूर्ण आंदोलन है। यह आंदोलन छात्रों के भविष्य और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। वांगचुक की भूख हड़ताल ने न केवल शिक्षा के मुद्दों को सामने लाया है, बल्कि यह समाज में जागरूकता फैलाने का भी एक माध्यम बन गया है।
भविष्य में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार वांगचुक के आंदोलन को गंभीरता से लेगी और क्या वे छात्रों के मुद्दों को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। वांगचुक के अनशन का प्रभाव केवल आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाले समय में भी शिक्षा प्रणाली पर पड़ेगा।
इस आंदोलन ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब लोग एकजुट होते हैं, तो वे अपनी आवाज़ को प्रभावी ढंग से उठा सकते हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है कि लोग अपने अधिकारों के लिए खड़े हो रहे हैं और यह दर्शाता है कि समाज में बदलाव की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
इस प्रकार, सोनम वांगचुक का अनशन न केवल एक आंदोलन है, बल्कि यह एक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह दर्शाता है कि शिक्षा के मुद्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है और यह भी कि छात्रों के जीवन को बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को लेकर वांगचुक के आंदोलन ने लोगों को जागरूक किया है। यह आंदोलन न केवल छात्रों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि शिक्षा का प्रभाव सभी वर्गों पर पड़ता है। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए आवश्यक है कि सरकार और संबंधित संस्थान इस दिशा में ठोस कदम उठाएं।
वांगचुक की भूख हड़ताल ने यह भी दिखाया है कि किस प्रकार व्यक्तिगत संघर्ष सामूहिक परिवर्तन का हिस्सा बन सकता है। जब एक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को खतरे में डालकर एक मुद्दे के लिए खड़ा होता है, तो यह समाज में एक नई चेतना का संचार करता है। यह आंदोलन न केवल शिक्षा के मुद्दों को उजागर करता है, बल्कि यह यह भी दर्शाता है कि लोगों की एकजुटता से बड़े बदलाव संभव हैं।
अंततः, वांगचुक का आंदोलन एक महत्वपूर्ण संदेश भेजता है - शिक्षा केवल एक व्यक्तिगत आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह समाज की प्रगति के लिए एक आवश्यक आधार है। जब तक हम शिक्षा के मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तब तक समाज में असमानता और अन्याय बढ़ता रहेगा। वांगचुक का अनशन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपने भविष्य के लिए क्या कर सकते हैं।
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