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मंदसौर के जॉइंट कलेक्टर राहुल चौहान के खिलाफ फैमिली कोर्ट का वसूली वारंट

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 15, 2026, 05:59 PM IST
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इंदौर की फैमिली कोर्ट ने जॉइंट कलेक्टर राहुल चौहान के खिलाफ भरण-पोषण राशि का भुगतान न करने पर गिरफ्तारी वारंट जारी किया है।

इंदौर की फैमिली कोर्ट ने मंदसौर के जॉइंट कलेक्टर राहुल चौहान के खिलाफ वसूली वारंट जारी किया है। यह मामला चौहान और उनकी पत्नी निर्मला के बीच तलाक और भरण पोषण के केस से संबंधित है। इस प्रकार के मामलों में अदालतें आमतौर पर पति या पत्नी की वित्तीय जिम्मेदारियों को सुनिश्चित करने के लिए सख्त होती हैं, खासकर जब एक पक्ष की ओर से भरण पोषण की राशि का भुगतान नहीं किया जा रहा हो।

कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर कार्यरत अधिकारी से अदालत के आदेशों का पालन करने की अपेक्षा अधिक होती है। भरण पोषण की राशि का भुगतान नहीं करने पर चौहान के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाएगा। यह आदेश इस बात का संकेत है कि अदालतें न केवल कानून को लागू करने में सक्षम हैं, बल्कि वे समाज में समानता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।

निर्मला चौहान ने फैमिली कोर्ट में याचिका लगाई थी कि अदालत के आदेश के बावजूद चौहान ने नियमित रूप से भरण-पोषण राशि का भुगतान नहीं किया। उनके ऊपर 5 लाख 56 हजार रुपए की राशि बकाया है। पिछली सुनवाई में उन्होंने केवल 40 हजार रुपए जमा किए हैं। यह स्थिति न केवल निर्मला के लिए बल्कि न्यायालय के लिए भी चिंताजनक है, क्योंकि यह दर्शाता है कि अदालत के आदेशों का पालन नहीं किया जा रहा है।

राहुल चौहान फिलहाल मंदसौर जिले की गरोठ तहसील में जॉइंट कलेक्टर हैं। उनकी वर्तमान स्थिति और जिम्मेदारियों को देखते हुए, यह मामला उनके पेशेवर जीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। प्रशासनिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों के लिए यह आवश्यक है कि वे व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में एक संतुलन बनाए रखें। मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई 2026 तय की गई है, जो इस बात का संकेत है कि न्यायालय इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।

कोर्ट ने हर महीने 20 हजार रुपए देने को कहा था

निर्मला चौहान के वकील प्रवीण कचोले ने बताया कि केस 31 अप्रैल 2023 से फैमिली कोर्ट में है। जहां 4 मई 2026 को हर महीने 20 हजार रुपए का भरण पोषण के लिए आदेश दिया गया था। यह आदेश इस बात का ध्यान रखता है कि बच्चों की भलाई और पत्नी की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। राहुल ने तब से सिर्फ एक बार पिछली पेशी में 40 हजार रुपए भरे हैं, जो कि अदालत के आदेश का पालन करने में उनकी अनिच्छा को दर्शाता है।

बुधवार को सुनवाई के दौरान राहुल चौहान कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। उनके वकील विनोद पाटीदार ने अदालत को बताया कि उन्हें अपने मुवक्किल की ओर से आगे की पैरवी या उपस्थिति को लेकर कोई निर्देश नहीं मिले हैं। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि प्रतिपक्ष की ओर से प्रभावी उपस्थिति नहीं है और न्यायालय के आदेश के बावजूद भरण-पोषण की शेष राशि का भुगतान भी नहीं किया गया। यह स्थिति अदालत के लिए गंभीर है, क्योंकि यह न्यायालय के प्रति अवमानना का संकेत देती है। अगली तारीख पर उन्हें कोर्ट में पेश होना होगा।

पत्नी ने लगाए हैं दहेज प्रताड़ना के आरोप

निर्मला चौहान ने 27 नवंबर 2025 को राहुल चौहान के खिलाफ इंदौर के महिला थाने में दहेज प्रताड़ना की FIR दर्ज कराई थी। इसमें लिखवाया था कि उनकी शादी 16 दिसंबर 2018 को हुई थी। तब राहुल चौहान ट्रेनी डिप्टी कलेक्टर थे। शादी दोनों परिवार की मर्जी से हुई थी, और निर्मला के परिवार ने अपनी हैसियत के अनुसार दहेज दिया था।

शादी के अगले दिन से ही उनके पति ने कम दहेज मिलने की बात कहते हुए मारपीट करना शुरू कर दिया। निर्मला ने यह भी बताया कि कुछ दिन बाद उनकी मां ने जमीन रजिस्ट्री के लिए 50 हजार रुपए उनके ससुर को दिए। इसके बाद वह पति के साथ खरगोन में रहने लगीं। यह स्थिति एक गंभीर सामाजिक मुद्दे को उजागर करती है, जिसमें दहेज प्रथा और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली घरेलू हिंसा का सामना महिलाओं को करना पड़ता है।

निर्मला ने पुलिस को बताया था कि जून 2019 में राहुल उन्हें दिल्ली ले गए, जहां उन्होंने दहेज के लिए प्रताड़ित किया। जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो 31 जुलाई 2019 को उन्हें उनकी मां के घर छोड़कर चले गए। इस तरह की घटनाएं न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि समाज में भी गंभीर प्रभाव डालती हैं। ऐसे मामलों में महिलाओं को अक्सर न्याय पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

सितंबर 2019 में राहुल ने उन्हें अपने साथ खरगोन ले आए, लेकिन प्रताड़ना का सिलसिला नहीं थमा। 21 सितंबर 2019 को उन्होंने निर्मला का मोबाइल तोड़ दिया और फिर मारपीट की। यह स्थिति न केवल मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है, बल्कि यह महिलाओं के अधिकारों का भी उल्लंघन करती है। इसके बाद निर्मला ने खरगोन थाने में शिकायत दर्ज कराई और अपनी मां के साथ इंदौर लौट आईं।

दहेज प्रताड़ना के मामले में न्यायालय की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार ऐसे मामलों में समझौते के प्रयास किए जाते हैं, लेकिन जब एक पक्ष सहयोग नहीं करता है, तो न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है। निर्मला के मामले में भी ऐसा ही हुआ, जहां दो-तीन बार परामर्श केंद्र ने समझौते का प्रयास किया, लेकिन पति ने उन्हें रखने से इनकार कर दिया। इसके बाद राहुल ने 2022 में तलाक का केस लगाया, जो 2023 में खारिज हो गया था।

इस प्रकार के मामले न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि समाज में भी गहरी छाप छोड़ते हैं। यह आवश्यक है कि ऐसे मामलों में न्यायालय और कानून प्रभावी तरीके से कार्य करें ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।

इस मामले के विभिन्न पहलुओं पर गौर करते हुए, यह स्पष्ट है कि दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर समाज में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनों की सख्ती और न्यायालयों की सक्रियता महत्वपूर्ण है।

इसी प्रकार के मामलों में अक्सर देखा गया है कि जब एक पक्ष न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं करता है, तो इससे न केवल पीड़ित को नुकसान होता है, बल्कि यह समाज में कानून और व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करता है। इसलिए, अदालतों को ऐसे मामलों में त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए।

इसके अलावा, यह भी जरूरी है कि प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारियों को समझा जाए। जब एक व्यक्ति, जो समाज में एक जिम्मेदार पद पर है, कानून का पालन नहीं करता है, तो यह अन्य लोगों के लिए भी एक गलत संदेश भेजता है। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई आवश्यक है ताकि समाज में कानून का राज और न्याय की स्थापना हो सके।

हाल ही में, मुरैना में एक डिप्टी कलेक्टर की गिरफ्तारी ने भी प्रशासनिक अधिकारियों के आचरण पर सवाल उठाए हैं। इस मामले में, अरविंद माहौर को एक युवती से रेप और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। ऐसे मामलों में, न्यायालय की भूमिका और सख्त कार्रवाई की आवश्यकता होती है ताकि समाज में विश्वास बना रहे और पीड़ितों को न्याय मिल सके।

इस प्रकार के घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों को अपने कार्यों और आचरण के प्रति अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। समाज की भलाई के लिए, उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन और पेशेवर जीवन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

अंत में, यह स्पष्ट है कि इस मामले में अदालत का निर्णय न केवल निर्मला चौहान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समाज में महिलाओं के अधिकारों और दहेज प्रथा के खिलाफ लड़ाई में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। अदालत की सक्रियता और सख्त कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि समाज में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो।

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