महाराष्ट्र सरकार ने आदिवासी हॉस्टल में रहने के लिए 30 साल की उम्र सीमा खत्म कर दी है। यह निर्णय छात्रों के आंदोलन के बाद लिया गया है।
नई दिल्ली, भारत 26 अग॰ 2026 ALN: महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में आदिवासी हॉस्टल में रहने के लिए 30 साल की उम्र सीमा को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके द्वारा मंगलवार को घोषित किया गया, जिसमें उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मंजूरी के बाद 14 अगस्त का सरकारी प्रस्ताव (GR) और उससे जुड़े संशोधित नियमों को वापस ले लिया गया है। इस बदलाव ने उन छात्रों के बीच खुशी की लहर दौड़ा दी है, जो इस उम्र सीमा के कारण प्रभावित हो रहे थे।
इस निर्णय का संदर्भ तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब इसे राहुल गांधी के पुणे में हुए 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के तीन दिन बाद लिया गया। इस कार्यक्रम में एक छात्रा ने आदिवासी हॉस्टल के नए नियमों और अन्य समस्याओं का मुद्दा उठाया था। उसने हॉस्टल में छात्राओं के साथ हो रही कुछ असामान्य व्यवस्थाओं के बारे में भी बताया, जिसमें लंबी छुट्टी के बाद हॉस्टल लौटने पर उन्हें प्रेग्नेंसी टेस्ट कराने के लिए मजबूर किया जाना शामिल था।
महाराष्ट्र सरकार ने 5 अगस्त को आदिवासी हॉस्टल के लिए नए नियम लागू किए थे, जिसमें हॉस्टल में रहने के लिए अधिकतम उम्र 26 साल निर्धारित की गई थी। हालांकि, 14 अगस्त को इस नियम को संशोधित करके उम्र सीमा को 26 से बढ़ाकर 30 साल कर दिया गया था। लेकिन इसके बाद छात्रों का विरोध शुरू हो गया। छात्रों ने सरकार से मांग की कि आदिवासी हॉस्टल से जुड़ा प्रस्ताव वापस लिया जाए और उसकी जगह नया आदेश जारी किया जाए।
पुणे के मांजरी स्थित आदिवासी हॉस्टल में आदिवासी छात्रों का आंदोलन 13 अगस्त से शुरू हुआ, जिसमें छात्रों ने धरना देने के बाद कुछ छात्रों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने का निर्णय लिया। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल हुए और भूख हड़ताल के दौरान कुछ छात्रों की तबीयत बिगड़ने की भी जानकारी सामने आई। छात्रों की मुख्य मांगों में 30 साल की उम्र सीमा समाप्त करना, हॉस्टल की सुविधाओं में सुधार और आदिवासी छात्रों से जुड़े पुराने मुद्दों का समाधान शामिल था।
छात्रों का तर्क था कि 30 साल की उम्र सीमा उन आदिवासी छात्रों को हॉस्टल से बाहर कर देगी, जो देर से पढ़ाई शुरू करते हैं या 30 साल के बाद उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। इस मुद्दे ने छात्रों के बीच चिंता और असंतोष को जन्म दिया, क्योंकि यह उनके भविष्य के लिए गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकता था।
राहुल गांधी ने 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के दौरान एक आदिवासी छात्रा के साथ बातचीत करते हुए कहा कि अगर वह उन्हें अपने प्रदर्शन में बुलातीं, तो वह वहां आकर प्रशासन पर और अधिक दबाव डाल सकते थे। छात्रा ने हॉस्टल में छात्राओं के साथ होने वाली व्यवस्था को लेकर अपनी शिकायत बताई। उसने कहा कि गड़चिरौली में जब छात्राएं एक महीने से ज्यादा समय के लिए घर जाती हैं और वापस लौटती हैं, तो उनसे प्रेग्नेंसी टेस्ट कराने के लिए कहा जाता है।
छात्रा के मुताबिक, जब उन्होंने प्रशासन से इस व्यवस्था की वजह पूछी, तो उन्हें बताया गया कि इतने दिन बाहर रहने के दौरान कहीं उन्हें कोई जानलेवा बीमारी तो नहीं हो गई। यह स्थिति न केवल छात्रों के लिए अपमानजनक थी, बल्कि उनके अधिकारों का भी उल्लंघन करती थी।
राहुल गांधी ने 24 अगस्त को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर छात्राओं की इन शिकायतों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि छात्रों की गूंज इवेंट के दौरान सरकारी आदिवासी हॉस्टलों में 30 साल की उम्र सीमा, अपमानजनक नियम, खराब सुरक्षा व्यवस्था और महिलाओं के लिए प्रेग्नेंसी टेस्ट जैसी शिकायतें सामने आई हैं। यह पत्र इस बात का संकेत है कि छात्रों की आवाज को सरकार के समक्ष लाने का प्रयास किया जा रहा है।
पुणे में राहुल ने महिलाओं की सुरक्षा, अधिकार और सामाजिक दबाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि महिलाओं को सुरक्षा देने की चिंता कई बार उन्हें नियंत्रित करने का तरीका बन जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत महिलाओं के सपने, सोच और क्षमता हैं। महिलाओं को केवल बेटी, पत्नी या मां की पहचान तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें प्रोफेशनल, खिलाड़ी, छात्रा और अन्य क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने का पूरा अधिकार होना चाहिए।
इस निर्णय के पीछे का तर्क यह है कि आदिवासी समुदाय के छात्रों को शिक्षा के अवसरों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। आदिवासी छात्रों की शिक्षा और उनके विकास के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम है, जो न केवल उनकी सामाजिक स्थिति को सुधारने में मदद करेगा, बल्कि उनके भविष्य के लिए भी सकारात्मक परिणाम उत्पन्न करेगा।
आंदोलन और इसके परिणाम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब छात्रों की आवाज को सही तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, तो सरकारें उनकी मांगों पर ध्यान देने के लिए मजबूर होती हैं। यह घटना यह भी दर्शाती है कि छात्रों की सक्रियता और एकजुटता महत्वपूर्ण है, खासकर जब उनके अधिकारों और भविष्य की बात आती है।
महाराष्ट्र सरकार का यह निर्णय आदिवासी छात्रों के लिए एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन यह भी आवश्यक है कि सरकार हॉस्टल में रहने की अन्य सुविधाओं और सुरक्षा पर भी ध्यान दे। छात्रों के लिए एक सुरक्षित और सहायक वातावरण सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर सकें और अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।
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