सीजेपी के संसद मार्च में मीडिया के ख़िलाफ़ नाराज़गी को लेकर आपस में भिड़े पत्रकार

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 21, 2026, 08:15 AM IST
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20 जुलाई को संसद के नज़दीक हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुछ चुनिंदे मीडिया घरानों के पत्रकारों के ख़िलाफ़ लोगों ने नाराज़गी जताते हुए नारे लगाए। इसे लेकर बहस हो रही है कि प्रदर्शनकारियों का मीडिया को लेकर यह रुख़ कितना सही है?

किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन में मीडिया या पत्रकारों का निशाना बनना अब कोई नई बात नहीं है। पिछले साल नेपाल में जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शन में भी यह देखने को मिला था।

नेपाली भाषा के प्रमुख अख़बार कांतिपुर के दफ़्तर में प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी थी। ऐसा ही बांग्लादेश में भी हुआ था। वहां के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द डेली स्टार के दफ़्तर को आग के हवाले कर दिया गया था। ये घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि जब भी सामाजिक या राजनीतिक असंतोष बढ़ता है, तो मीडिया को अक्सर उसके नतीजों का सामना करना पड़ता है।

भारत में 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च में भी मीडिया को लेकर नाराज़गी साफ़ दिखी। दरअसल पिछले कुछ वर्षों में भारत में मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मीडिया के प्रति जनता की धारणा में बदलाव आया है, और इसके पीछे कई कारण हैं।

एक इम्प्रेशन बना है कि कौन मीडिया घराना सरकार परस्त है और कौन सरकार विरोधी। ऐसा में कहा जाता है कि भारत में मीडिया बहुत ही ध्रुवीकृत हो गया है। यह ध्रुवीकरण न केवल राजनीतिक विचारधाराओं के बीच है, बल्कि यह पत्रकारों के व्यक्तिगत अनुभवों और उनकी रिपोर्टिंग पर भी प्रभाव डालता है।

20 जुलाई के विरोध-प्रदर्शन के दौरान चुनिंदा मीडिया घरानों को पत्रकारों के ख़िलाफ़ लोगों ने नाराज़गी जताते हुए नारे लगाए। इसे लेकर सोशल मीडिया पर बहस हो रही है कि प्रदर्शनकारियों का मीडिया को लेकर यह रुख़ कितना सही है। सोशल मीडिया ने इस बहस को और भी बढ़ावा दिया है, जहां लोग अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं और एक-दूसरे के विचारों को चुनौती दे रहे हैं।

सोमवार को मीडिया के ख़िलाफ़ नाराज़गी में कुछ वैसे पत्रकार भी रिपोर्टिंग के दौरान निशाने पर आए जिनकी छवि सरकार परस्त वाली नहीं है। यह स्थिति दिखाती है कि असंतोष का यह स्तर अब पत्रकारों के लिए भी सुरक्षा का मुद्दा बन गया है।

विरोध प्रदर्शन में पत्रकारों के ख़िलाफ़ नाराज़गी का एक वीडियो क्लिप रीपोस्ट करते हुए पत्रकार पूनम पांडे ने एक्स पर लिखा है, ''मीडिया से नाराज़गी हो सकती है लेकिन रिपोर्टर को टारगेट करना सही नहीं है। रिपोर्टर ही है जो ग्राउंड पर उतरता है, तपती धूप हो या बरसात। नाराज़गी सही जगह निकलनी चाहिए।'' उनका यह बयान इस बात को उजागर करता है कि पत्रकारों को भी एक तरह से लक्षित किया जा रहा है, जो कि उनके पेशेवर कर्तव्यों के लिए खतरनाक हो सकता है।

इसके जवाब में प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने लिखा, ''टीवी पर नफ़रत फैलाने वाले एंकरों, प्रेजेंटरों और वरिष्ठ पत्रकारों के साथ टीवी रिपोर्टरों के बीच फ़र्क़ करना ज़रूरी है। टीवी रिपोर्टरों में से अधिकांश काफ़ी मेहनती होते हैं।'' यह टिप्पणी इस बात पर बल देती है कि पत्रकारिता में विभिन्न स्तरों पर कार्यरत लोग हैं, और सभी को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।

लेकिन विजेता सिंह की यह बात इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता को पसंद नहीं आई। जवाब में शेखर गुप्ता ने लिखा, ''नहीं विजेता, हम यह फ़ैसला भीड़ पर नहीं छोड़ सकते कि किस पत्रकार से प्यार किया जाए और किससे नफ़रत। वरिष्ठ हों या जूनियर, हर पत्रकार को अपना काम करते समय पूरी तरह सुरक्षित महसूस होना चाहिए। एक भीड़ के लिए जो 'अच्छा' पत्रकार है, वही दूसरी भीड़ के लिए 'ख़लनायक' हो सकता है।''

शेखर गुप्ता की यह टिप्पणी मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा के मुद्दे को उठाती है। यह स्पष्ट करता है कि पत्रकारों को अपनी रिपोर्टिंग के लिए सुरक्षित माहौल की आवश्यकता है, ताकि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें।

''इस प्रवृत्ति की शुरुआत अन्ना आंदोलन के दौरान हुई थी और उस समय भी कई पक्षधर लोगों ने इसका समर्थन किया था। तब भी यह ग़लत था और आज भी ग़लत है।'' यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है, क्योंकि यह दिखाता है कि असहमति और विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के प्रति हिंसा की प्रवृत्ति एक दीर्घकालिक समस्या है।

न्यूज़ लॉन्ड्री के सह-संस्थापक अभिनंदन सिकरी ने भी शेखर गुप्ता की इस टिप्पणी की आलोचना की और एक्स पर लिखा है, ''आपका यह बयान कई स्तरों पर खामियों से भरा हुआ है और उन्हें ट्विटर पर समेटकर समझाना संभव नहीं है। अगर आप निमंत्रण स्वीकार करें, तो मैं ख़ुशी से इस पर विस्तार से चर्चा करना चाहूंगा.'' यह सुझाव देता है कि मीडिया के भीतर भी विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं, और पत्रकारों के बीच संवाद की आवश्यकता है।

अभिनंदन सिकरी ने एक और टिप्पणी में लिखा है, ''जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए पहुँचे तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया को ज़रा गौर से देखिए। वहाँ उन गैर-पत्रकारीय गुंडों को भी पहचानिए जो उसी मक़सद से मौजूद हैं। यही उनका स्तर है और यही वह जमात है, जिससे उनका संबंध है.'' यह बयान मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है और यह भी दर्शाता है कि कुछ पत्रकारों की कार्यशैली ने समग्र पत्रकारिता को प्रभावित किया है।

लेकिन आज तक की राजनीतिक संपादक मौसमी सिंह ने शेखर गुप्ता की बातों का समर्थन करते हुए लिखा है, ''मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। मुझे भी सबरीमला आंदोलन और किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान धमकियों, मारपीट और गाली-गलौज का सामना करना पड़ा था.'' उनका अनुभव यह बताता है कि पत्रकारों को न केवल विरोध प्रदर्शन के दौरान बल्कि सामान्य स्थिति में भी खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

''एक महिला रिपोर्टर, जो दूसरे न्यूज़ नेटवर्क से थीं और राष्ट्रीय राजमार्ग पर आंदोलन की कवरेज कर रही थीं, उनके साथ पुल के नीचे कथित तौर पर छेड़छाड़ की गई और उन्हें खींचा गया। वह नई-नई रिपोर्टिंग शुरू करने वाली पत्रकार थीं और इस घटना से पूरी तरह सहम गई थीं। पत्रकारों के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की हिंसा, चाहे वह शारीरिक हो या मौखिक, उसे किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता.'' यह घटना इस बात का उदाहरण है कि पत्रकारिता का कार्य कितना जोखिम भरा हो सकता है, विशेषकर जब वे संवेदनशील मुद्दों को कवर कर रहे होते हैं।

जानी-मानी कॉलमिस्ट और लेखक तवलीन सिंह ने एक्स पर लिखा है, ''भारतीय मीडिया का लगभग 50 वर्षों तक हिस्सा रहने के नाते मैं यह दर्ज कराना चाहती हूँ कि मुझे हमारे तथाकथित 'स्वतंत्र' टीवी चैनलों पर शर्म आती है। उन्हें ख़ुद को दूरदर्शन 2.0 घोषित कर देना चाहिए और अपनी स्वतंत्रता का दावा छोड़ देना चाहिए.'' यह बयान मीडिया की स्वतंत्रता और उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है।

शॉर्ट पोस्ट के संस्थापक संपादक एबी रवि ने पिछले महीने 28 जून को अंग्रेज़ी पत्रिका ओपन में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने बताया है कि आज के "डॉग-ईट-डॉग" माहौल, शोर-शराबे वाली टीवी पत्रकारिता और सोशल मीडिया की विषाक्त बहसों के कारण चीज़ें बहुत बदली हैं. यह स्थिति मीडिया की विश्वसनीयता को और भी कमजोर बनाती है, क्योंकि दर्शक अब समाचारों को संदिग्ध नजरिए से देखने लगे हैं।

एबी रवि ने लिखा था, ''उनका कहना है कि इस बदलाव की एक वजह यह भी रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पत्रकारों की मंत्रालयों तक अनौपचारिक पहुँच सीमित कर दी और विदेश यात्राओं में पत्रकारों को साथ ले जाने की परंपरा समाप्त कर दी। आज पत्रकारिता आजीवन पेशा बनने के बजाय राजनीति या जनसंपर्क (पीआर) में जाने का माध्यम बनती जा रही है.'' यह स्थिति दर्शाती है कि पत्रकारिता के पेशे में भी बदलाव आ रहा है, जो कि उसकी स्वतंत्रता और उसकी भूमिका को प्रभावित कर रहा है।

इन सभी घटनाओं और विचारों के बीच, यह स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया को एक चुनौतीपूर्ण समय का सामना करना पड़ रहा है। पत्रकारों को न केवल अपने कार्यों के लिए बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। यह एक गंभीर मुद्दा है, जिसे समाज और सरकार दोनों को गंभीरता से लेना चाहिए।

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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