झारखंड हाईकोर्ट ने निर्मल महतो हत्याकांड में उम्रकैद काट रहे नरेंद्र सिंह की समय पूर्व रिहाई को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
रांची, भारत 16 जुल॰ 2026 ALN: रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
High Court, रांची : झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय की एकल पीठ ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के कद्दावर नेता रहे निर्मल महतो की हत्या के मामले में उम्रकैद काट रहे नरेंद्र सिंह उर्फ पंडित की समय पूर्व रिहाई को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के 28 मार्च 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें नरेंद्र सिंह की रिहाई की अर्जी को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि बोर्ड ने राज्य सरकार की रिमिशन नीति के मानकों पर गौर किए बिना, केवल अपराध की प्रकृति को आधार बनाकर आवेदन खारिज कर दिया, जो कानूनन सही नहीं है। अदालत ने अब इस मामले को वापस बोर्ड के पास भेजते हुए तीन महीने के भीतर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि सजा समीक्षा बोर्ड ने नरेंद्र सिंह की रिहाई को यह कहते हुए नामंजूर किया था कि वह एक बेहद लोकप्रिय जनप्रतिनिधि की राजनीतिक हत्या का दोषी है और उसे छोड़ने से समाज में गलत संदेश जाएगा। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की 26 मई 2011 की नीति के तहत समय पूर्व रिहाई के लिए बोर्ड को पांच प्रमुख मानकों पर विचार करना अनिवार्य है। इन मानकों में अपराध का सामाजिक प्रभाव, भविष्य में दोबारा अपराध करने की संभावना, अपराध की पुनरावृत्ति की कम आशंका, आगे हिरासत में रखने की व्यावहारिक आवश्यकता और दोषी की वर्तमान सामाजिक-पारिवारिक स्थिति का मूल्यांकन शामिल है। अदालत ने यह भी नोट किया कि जेल के प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट नरेंद्र सिंह की रिहाई के पक्ष में थी, लेकिन बोर्ड ने इन सभी जरूरी मानकों की अनदेखी कर केवल राजनीतिक हत्या होने के आधार पर फैसला सुना दिया था।
निर्मल महतो की हत्या का मामला झारखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाता है। महतो, जो झामुमो के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, ने झारखंड के गठन के लिए एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। उनकी हत्या ने न केवल उनके समर्थकों में आक्रोश फैलाया, बल्कि राज्य की राजनीतिक स्थिति को भी प्रभावित किया। इस हत्या के बाद से, झारखंड में राजनीतिक प्रतिशोध और हिंसा की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।
नरेंद्र सिंह उर्फ पंडित ने क्रिमिनल रिट याचिका दायर कर रिहाई की गुहार लगाई थी। उसने अदालत को बताया कि वह तेईस वर्ष की वास्तविक कैद और रिमिशन (छूट) मिलाकर कुल उनतीस वर्ष की सजा पूरी कर चुका है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने भी तीन जुलाई 2023 को राज्य सरकार को उसकी रिमिशन याचिका पर कानून के मुताबिक जल्द निर्णय लेने का आदेश दिया था। जमशेदपुर के चमरिया टाटा स्टील गेस्ट हाउस के पास आठ अगस्त 1987 को निर्मल महतो की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच अठारह नवंबर 1987 को सीबीआई को सौंपी गई थी। इसके बाद वर्ष 2001 में धीरेंद्र सिंह और 2003 में नरेंद्र सिंह उर्फ पंडित की गिरफ्तारी हुई थी। बिष्टुपुर थाने में पूर्व सांसद सूरज मंडल की सूचना पर केस दर्ज किया गया था। इस हत्याकांड में नरेंद्र सिंह सहित तीन आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जिनमें से एक दोषी वीरेंद्र सिंह की जेल में सजा काटने के दौरान मौत हो चुकी है।
इस मामले में हाईकोर्ट का निर्णय न केवल नरेंद्र सिंह के लिए बल्कि झारखंड की न्याय प्रणाली पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। यदि सजा समीक्षा बोर्ड को निर्देशित किया जाता है कि वह रिहाई के लिए उचित मानकों पर विचार करे, तो यह भविष्य में अन्य कैदियों के मामलों में भी एक मिसाल पेश कर सकता है। यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि न्यायालय ने न केवल कानून के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाया है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया है कि राजनीतिक दबाव के बावजूद न्याय का मार्ग प्रशस्त किया जाए।
झारखंड की सजा समीक्षा नीति, जो 2011 में लागू हुई थी, का उद्देश्य कैदियों की रिहाई के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी प्रक्रिया प्रदान करना है। इस नीति के तहत, कैदियों की रिहाई के लिए निर्धारित मानकों पर विचार किया जाता है, जिसमें उनके द्वारा किए गए अपराध का सामाजिक प्रभाव और भविष्य में अपराध करने की संभावना भी शामिल है। हालांकि, इस मामले में, हाईकोर्ट ने यह पाया कि सजा समीक्षा बोर्ड ने इन मानकों की अनदेखी की थी, जो कि एक गंभीर मुद्दा है।
निर्मल महतो की हत्या के बाद से झारखंड में राजनीतिक माहौल काफी तनावपूर्ण रहा है। महतो की हत्या ने झामुमो और अन्य राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष को बढ़ावा दिया, जिससे राज्य में राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ी। इस हत्या के बाद झामुमो ने महतो को एक शहीद का दर्जा दिया और उनकी याद में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस घटना ने झारखंड में राजनीतिक हिंसा के इतिहास को भी उजागर किया, जहां राजनीतिक प्रतिशोध के चलते कई नेताओं की हत्या की गई है।
इस निर्णय के बाद, यह देखना होगा कि सजा समीक्षा बोर्ड इस मामले पर क्या निर्णय लेता है। यदि बोर्ड नरेंद्र सिंह की रिहाई की अनुमति देता है, तो यह निश्चित रूप से झारखंड की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है। इससे यह भी संकेत मिल सकता है कि न्यायालय ने राजनीतिक हत्या के मामलों में भी न्याय की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है।
अंततः, हाईकोर्ट का यह फैसला केवल नरेंद्र सिंह के लिए नहीं, बल्कि झारखंड के न्यायिक और राजनीतिक परिदृश्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय के पास राजनीतिक दबाव से दूर रहकर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की क्षमता है। इसके साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायालय सभी कैदियों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, चाहे उनके द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति कुछ भी हो।
निर्मल महतो की हत्या के मामले में न्यायालय का यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह निर्णय इस बात का संकेत है कि न्यायालय ने मानवीय पहलुओं को भी ध्यान में रखा है और यह सुनिश्चित किया है कि रिहाई के मामलों में केवल अपराध की प्रकृति के आधार पर निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए।
झारखंड में राजनीतिक हिंसा की घटनाओं को देखते हुए, यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि न्यायालय ने समाज में व्याप्त डर और असुरक्षा को समझा है। यदि न्यायालय ने केवल राजनीतिक हत्या के आधार पर रिहाई को नामंजूर किया होता, तो यह एक खतरनाक उदाहरण स्थापित कर सकता था।
अंत में, यह निर्णय न केवल न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को बढ़ावा देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायालय ने समय पूर्व रिहाई के मामलों में उचित मानकों का पालन करने की आवश्यकता को समझा है। यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि न्यायालय राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर निर्णय लेने की क्षमता रखता है और यह सुनिश्चित करता है कि सभी कैदियों को समान न्याय मिले।
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