छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में महिला डॉक्टर डॉ. प्रियंका सोनी को फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। यह मामला स्नेक बाइट से मौत दिखाकर मुआवजा दिलाने से जुड़ा है।
नई दिल्ली, भारत 19 जुल॰ 2026 ALN: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हाल ही में एक गंभीर अपराध का मामला सामने आया है, जिसमें एक महिला डॉक्टर को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। डॉ. प्रियंका सोनी, जो सिम्स में कार्यरत थीं, पर आरोप है कि उन्होंने दो मामलों में स्नेक बाइट से मौत की फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार की थी। यह मामला तोरवा थाना क्षेत्र का है, जहां पुलिस ने एक विस्तृत जांच के बाद इस अपराध का खुलासा किया।
पुलिस के अनुसार, तहसील कार्यालय के नायब नाजीर की शिकायत के बाद मामले की जांच शुरू की गई। शिकायत में मृतक निसार खान और लता सूर्यवंशी की संदिग्ध मौतों का जिक्र था। जांच के दौरान पता चला कि दोनों शवों का पोस्टमार्टम डॉ. प्रियंका सोनी ने किया था और उन्होंने स्नेक बाइट से मौत का फर्जी प्रमाणपत्र जारी किया था।
इस जांच के परिणामस्वरूप, पुलिस ने 18 जुलाई को डॉ. प्रियंका सोनी को गिरफ्तार किया और उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। यह गिरफ्तारी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले इस मामले में दो मृतकों के रिश्तेदार और एक वकील समेत तीन अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका था। इसके अलावा, पुलिस ने बताया कि स्नेक बाइट से संबंधित 15 मामलों की जांच चल रही है, जिसमें 4-5 अन्य डॉक्टर भी शामिल हैं।
रिश्तेदार और वकील पहले ही जा चुके हैं जेल
इस मामले में मृतक निसार खान की पत्नी सफीना बानो और लता सूर्यवंशी के पति संतोष सूर्यवंशी को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इसके अलावा, एक वकील रंजीत कुमार चतुर्वेदी भी इस मामले में शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, मुख्य आरोपी वकील श्रवण वस्त्रकार अब भी फरार हैं, और वह लंबे समय से गंभीर बीमारी का इलाज करा रहे हैं। यह स्थिति जांच में और भी जटिलता पैदा कर रही है।
सिविल लाइन थाने में भी दर्ज है मामला
डॉ. प्रियंका सोनी के खिलाफ सिविल लाइन थाने में भी एक अलग मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि उन्होंने तालापारा निवासी पवन यादव की मौत को स्नेक बाइट बताया था, जबकि जांच में पाया गया कि उनकी मौत का कारण हार्ट अटैक था। इस मामले में भी पवन यादव की पत्नी और एक अन्य आरोपी को गिरफ्तार किया जा चुका है। सिविल लाइन पुलिस अब जेल से प्रोडक्शन वारंट पर डॉक्टर को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की योजना बना रही है।
2 दिन पहले 4 आरोपी गिरफ्तार
इस क्रम में, 16 जुलाई को सरकंडा थाना पुलिस ने फर्जी स्नेक बाइट के पांच मामलों में कार्रवाई करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें वकील हीराप्रसाद खाण्डेकर, बैंककर्मी कुशकुमार गुप्ता, कथित वकील महेन्द्र कुमार और तहसीलदार के दैनिक वेतनभोगी चालक गोविंद विश्वकर्मा शामिल हैं। इन गिरफ्तारियों से यह स्पष्ट होता है कि यह मामला एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जिसमें कई लोग शामिल हैं।
एक साल पहले भी हो चुकी है गिरफ्तारी
यह पहली बार नहीं है जब डॉ. प्रियंका सोनी का नाम इस तरह के अपराध में आया है। साल 2025 में, बिल्हा थाना क्षेत्र में जहर खाने से हुई एक मौत को स्नेक बाइट बताकर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने का मामला सामने आया था। उस मामले में भी डॉ. प्रियंका सोनी, मृतक के परिजन और एक वकील को गिरफ्तार किया गया था। इस प्रकार के अपराधों की पुनरावृत्ति से यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में चिकित्सा पेशेवरों की नैतिकता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
कई डॉक्टर जांच के दायरे में
पुलिस के अनुसार, जिले में फर्जी स्नैक बाइट से मौत दिखाकर मुआवजा दिलाने के 15 मामलों की जांच चल रही है। सभी मामलों की समीक्षा कर सबूत जुटाए जा रहे हैं। इस जांच के दायरे में सिम्स के 4 से 5 डॉक्टर भी हैं, जिन पर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने का संदेह है। कुछ डॉक्टरों से पूछताछ की जा चुकी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियों की संभावना है।
इस घटना ने चिकित्सा क्षेत्र में नैतिकता और पेशेवर जिम्मेदारियों पर एक बार फिर से ध्यान केंद्रित किया है। जब चिकित्सा पेशेवर इस तरह के अपराधों में लिप्त होते हैं, तो यह न केवल उनके पेशेवर जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में स्वास्थ्य सेवाओं पर विश्वास को भी कमजोर करता है।
इस मामले में आगे की जांच यह निर्धारित करेगी कि क्या और भी लोग इस नेटवर्क का हिस्सा हैं और क्या अन्य चिकित्सकों को भी इस तरह के अपराधों में शामिल पाया जाएगा। पुलिस ने जनता से अपील की है कि यदि उन्हें इस तरह के अन्य मामले पता चलें, तो वे तुरंत शिकायत करें।
इस घटना के बाद, यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा संस्थान इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं। इसके अलावा, यह भी महत्वपूर्ण है कि चिकित्सा पेशेवरों के लिए नैतिकता और पेशेवर जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए, ताकि भविष्य में इस तरह के मामलों की पुनरावृत्ति न हो सके।
फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बनाने की घटनाएं केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे देश में एक गंभीर समस्या बनती जा रही हैं। कई बार ऐसे मामलों में मुआवजे के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया जाता है, जिससे न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग होता है, बल्कि यह स्वास्थ्य प्रणाली की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है।
चिकित्सा क्षेत्र में ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से यह स्पष्ट होता है कि कुछ चिकित्सकों में नैतिकता की कमी है। यह स्थिति न केवल उनके लिए, बल्कि उनके पेशेवर जीवन के लिए भी हानिकारक है। ऐसे मामलों को रोकने के लिए, चिकित्सा संस्थानों को सख्त नियम और दिशा-निर्देश स्थापित करने की आवश्यकता है।
इस प्रकार की घटनाओं के पीछे एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि मुआवजे की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। यदि मुआवजा प्राप्त करने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सुसंगत होती, तो ऐसे मामलों की संख्या में कमी आ सकती थी।
इसके अलावा, यह भी महत्वपूर्ण है कि समाज में लोगों को इस तरह के अपराधों के प्रति जागरूक किया जाए। जब लोग इस तरह के मामलों के बारे में जानेंगे, तो वे ऐसे अपराधों की रिपोर्ट करने में अधिक सक्रिय होंगे।
अंत में, यह स्पष्ट है कि इस मामले की जांच केवल एक व्यक्ति या एक समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक समस्या का हिस्सा है, जिसमें चिकित्सा पेशेवरों की नैतिकता, सरकारी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और समाज की जागरूकता शामिल है। यदि इन सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो भविष्य में इस तरह के मामलों की पुनरावृत्ति को रोका जा सकता है।
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