दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनम वांगचुक को निजी अस्पताल में ट्रांसफर की मांग ठुकराई

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 19, 2026, 05:22 PM IST
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दिल्ली हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से निजी अस्पताल में ट्रांसफर करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में सामाजिक और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से निजी अस्पताल में ट्रांसफर करने की मांग पर राहत देने से इनकार कर दिया। यह आदेश रविवार, 19 जुलाई को जस्टिस मिनी पुष्करणा द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने कहा कि इस मामले में किसी अंतरिम आदेश की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई को तय की है। वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि जे. आंगमो द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, सफदरजंग अस्पताल और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में वांगचुक को उनकी पसंद के निजी अस्पताल में ट्रांसफर करने की अनुमति देने की मांग की गई थी।

सोनम वांगचुक, जो एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता हैं, को उनकी भूख हड़ताल के 21वें दिन दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले जाया था। उन्होंने 28 जून से नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं के विरोध में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। यह भूख हड़ताल न केवल उनके व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए बल्कि शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम था। वांगचुक की यह हड़ताल कई छात्रों और उनके परिवारों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा बन गई है।

डॉक्टर लगातार कर रहे हैं निगरानी- कोर्ट

सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टर वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति की लगातार निगरानी कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि इस स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि वांगचुक के साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती की जा रही है। इसके अलावा, अदालत ने यह भी माना कि जंतर-मंतर से उन्हें अस्पताल ले जाने की सरकारी कार्रवाई को प्रथम दृष्टा मनमाना नहीं कहा जा सकता। यह बयान इस बात को दर्शाता है कि अदालत ने वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति और उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

परिवार को 24 घंटे मिलने की अनुमति

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि वांगचुक के परिवार के सदस्य, जिसमें उनकी पत्नी, भाई और अन्य रिश्तेदार शामिल हैं, उन्हें 24 घंटे मिलने की अनुमति दी गई है। यह कदम वांगचुक के मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आवश्यकता पड़ी और वांगचुक खुद तैयार होंगे, तो वे डॉक्टरों के इलाज में सहयोग करेंगे। यह सहयोग महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे डॉक्टरों को उनकी स्वास्थ्य स्थिति को बेहतर ढंग से समझने और उचित उपचार योजना बनाने में सहायता मिलेगी।

सरकार ने कहा- इलाज में सहयोग करें

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने अदालत में कहा कि सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टर वांगचुक का उचित इलाज कर रहे हैं और इस पर संदेह की कोई वजह नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि बेहतर इलाज के लिए वांगचुक का सहयोग भी आवश्यक है। यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि सरकारी अस्पतालों में भी उच्च गुणवत्ता का इलाज उपलब्ध है और यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि मरीज अपनी स्वास्थ्य स्थिति के प्रति सक्रिय रहें।

कपिल सिब्बल ने उठाया अधिकार का सवाल

वांगचुक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि उनके क्लाइंट को मेदांता अस्पताल स्थानांतरित किया जाए। उन्होंने दलील दी कि सोनम वांगचुक किसी हिरासत में नहीं हैं, इसलिए उन्हें अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह तर्क इस बात को उजागर करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वास्थ्य देखभाल के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। वांगचुक का मामला इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को उठाता है कि क्या किसी व्यक्ति को उनके स्वास्थ्य संबंधी निर्णयों में स्वतंत्रता दी जानी चाहिए, विशेष रूप से जब वे किसी प्रकार की भूख हड़ताल पर हों।

भूख हड़ताल का सामाजिक संदर्भ

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का सामाजिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह हड़ताल तब शुरू की जब उन्होंने देखा कि नीट परीक्षा में अनियमितताएँ सामने आईं हैं और इसके कारण कई छात्रों ने आत्महत्या का रास्ता चुना। यह घटना न केवल शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे शिक्षा से संबंधित मुद्दे युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। वांगचुक का यह कदम एक प्रकार का विरोध है, जो यह दर्शाता है कि वे छात्रों के अधिकारों के लिए खड़े हैं और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

यह मामला अब केवल सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य का नहीं रह गया है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक मुद्दा बन गया है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार शामिल हैं। इस प्रकार के मामलों में अदालतों का निर्णय न केवल तत्काल स्थिति को प्रभावित करता है, बल्कि यह भविष्य में समान मामलों में भी महत्वपूर्ण precedents स्थापित कर सकता है।

अंततः, दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय और वांगचुक की भूख हड़ताल, दोनों ही भारतीय समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देते हैं। यह आवश्यक है कि समाज और सरकार दोनों इस मुद्दे को गंभीरता से लें और उचित कदम उठाएं ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचा जा सके।

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के पीछे का कारण, नीट परीक्षा में अनियमितताओं का मुद्दा, एक व्यापक समस्या का संकेत है जो भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्याप्त है। यह समस्या न केवल छात्रों के लिए बल्कि उनके परिवारों और समाज के लिए भी गंभीर परिणाम ला सकती है। शिक्षा की गुणवत्ता और समानता पर सवाल उठाते हुए, यह मुद्दा शिक्षा के अधिकार को लेकर एक बड़ा बहस का विषय बन गया है।

शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता के साथ-साथ, वांगचुक की भूख हड़ताल ने इस बात को भी उजागर किया है कि कैसे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। छात्रों की आत्महत्या की घटनाएँ एक गंभीर चिंता का विषय हैं और यह दर्शाती हैं कि शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। वांगचुक का यह कदम न केवल उनकी व्यक्तिगत लड़ाई है, बल्कि यह एक सामूहिक आवाज है जो शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग कर रही है।

इस संदर्भ में, यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकार और शिक्षा संस्थान छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और उनके लिए एक सहायक वातावरण तैयार करें। इसके अलावा, छात्रों को अपनी समस्याओं को साझा करने और समाधान खोजने के लिए एक मंच प्रदान करना भी आवश्यक है।

वांगचुक का मामला और उनकी भूख हड़ताल, छात्रों के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण संघर्ष का प्रतीक बन गया है। यह न केवल शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे व्यक्तिगत स्वास्थ्य और स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। इस प्रकार, यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गया है।

इस तरह के मामलों में अदालतों का निर्णय न केवल तत्काल स्थिति को प्रभावित करता है, बल्कि यह भविष्य में समान मामलों में भी महत्वपूर्ण precedents स्थापित कर सकता है। इसलिए, यह आवश्यक है कि समाज और सरकार दोनों इस मुद्दे को गंभीरता से लें और उचित कदम उठाएं ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचा जा सके।

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