मध्य प्रदेश विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक 2026 प्रस्तुत किया गया है, जिसमें शादी के एक साल बाद ही तलाक पर विचार होगा।
रायपुर, भारत 21 जुल॰ 2026 ALN: राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश विधानसभा में सोमवार को मानसून सत्र के पहले ही दिन समान नागरिक संहिता विधेयक 2026 प्रस्तुत कर दिया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कैबिनेट की मंजूरी के बाद राज्य मंत्री गौतम टेटवाल ने इसे सदन के पटल पर रखा। इस दौरान विपक्षी दल कांग्रेस ने बिल को पूरक कार्यसूची के जरिए अचानक लाने पर आपत्ति जताते हुए भारी हंगामा किया। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के अनुसार, इस विधेयक पर मंगलवार को विस्तृत चर्चा की जाएगी।
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) का प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है, जो विभिन्न धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को एक समान कानूनी ढांचे में लाने का प्रयास करता है। यह विधेयक मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों (मुस्लिम पर्सनल लॉ) को बुनियादी तौर पर बदल देगा। इसके तहत मुख्य रूप से चार बड़े क्षेत्रों में सीधे बदलाव आएंगे।
इस विधेयक के अनुसार, बहुविवाह (चार शादियां) और निकाह हलाला पूरी तरह प्रतिबंधित होंगे। यह कदम उन प्रथाओं के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश है जो महिलाओं के अधिकारों का हनन करती हैं। शादी के लिए लड़कियों की उम्र अनिवार्य रूप से 18 वर्ष होगी, जो बाल विवाह के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम है। तलाक केवल अदालत के माध्यम से ही संभव होगा, जिससे विवादों का समाधान कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा। विवाह के एक वर्ष बाद ही विवाह विच्छेद की अर्जी पर विचार हो सकेगा, जिससे विवाह की स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा।
मुस्लिम पर्सनल लॉ की एक-तिहाई संपत्ति वसीयत करने की सीमा समाप्त हो जाएगी, जिससे मुस्लिम नागरिक अपनी शत-प्रतिशत संपत्ति किसी को भी वसीयत कर सकेंगे। यह बदलाव मुस्लिम महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अधिकार है, क्योंकि वर्तमान में उन्हें संपत्ति के मामले में पुरुषों की तुलना में कम अधिकार प्राप्त हैं। बिना वसीयत की संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर हक मिलेगा, जो समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को इद्दत (तलाक या पति की मृत्यु के बाद बिताने वाली अवधि) की अवधि के बाद भी आजीवन (या दूसरी शादी होने तक) गुजारा भत्ता पाने का कानूनी अधिकार होगा। यह प्रावधान महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करेगा और उनके अधिकारों की रक्षा करेगा।
मुस्लिम परिवारों को अन्य नागरिकों की तरह कानूनी रूप से बच्चा गोद लेने का अधिकार और प्रक्रियागत मान्यता मिलेगी। यह बदलाव परिवारों को एक नई दिशा देगा और बच्चों के लिए एक स्थायी घर सुनिश्चित करेगा।
यूसीसी के लागू होने के बाद मध्य प्रदेश में लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण कराना होगा। ऐसा न करने पर तीन महीने की जेल या 10 हजार जुर्माने का प्रावधान है। लिव इन पंजीयन उसी सूरत में नहीं होगा, जहां कम से कम एक व्यक्ति विवाहित हो, पहले से ही लिव इन संबंध में हो, एक अवयस्क हो या जहां गलत पहचान बताई गई हो।
जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या एआरटी के जरिए जन्मे सभी बच्चों को समान कानूनी हक मिलेगा। अवैध संतान जैसे शब्दों को समाप्त किया जाएगा, जो बच्चों के प्रति समाज के दृष्टिकोण को सकारात्मक दिशा में ले जाने का प्रयास है। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत आने वाली भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया जैसी अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है, जो उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक और पारंपरिक जरूरतों को ध्यान में रखने का संकेत है।
पैतृक संपत्ति में अब तक मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधा हिस्सा मिलता है, यूसीसी में इसकी जगह बेटियों को बेटों के बराबर संपत्ति का अधिकार मिलेगा और पत्नी को भी पति की संपत्ति में उचित हिस्सा मिलेगा। यह बदलाव महिलाओं के आर्थिक स्वतंत्रता और अधिकारों को मजबूत करेगा।
वसीयत से जुड़े प्रावधान में संपत्ति हस्तांतरण की पूरी आजादी होगी। नए कानून के तहत कोई भी व्यक्ति (चाहे वह किसी भी धर्म का हो) अपनी पूरी संपत्ति किसी को भी वसीयत के जरिए दे सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में वर्तमान में कोई भी व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति के केवल एक-तिहाई हिस्से की ही वसीयत कर सकता है। यूसीसी लागू होने के बाद यह सीमा समाप्त हो जाएगी।
यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत किए मर जाता है, तो संपत्ति में बेटियों और बेटों को बिल्कुल बराबर का हिस्सा मिलेगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ का वह नियम खत्म हो जाएगा जिसके तहत महिलाओं को पुरुषों से आधा हिस्सा मिलता था। यह परिवर्तन न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक दृष्टि से भी एक बड़ा बदलाव है।
समान नागरिक संहिता का यह विधेयक केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह समाज में समानता, न्याय और अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है। इसके लागू होने से न केवल मध्य प्रदेश में बल्कि पूरे देश में समान नागरिकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जाएगा। हालांकि, इसे लागू करने में चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं, जिसमें विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संभावित विरोध और सामाजिक ध्रुवीकरण शामिल हो सकते हैं। इस विधेयक के अंतर्गत किए गए बदलावों के प्रभाव का आकलन भविष्य में किया जाएगा, जब इसे लागू किया जाएगा और इसके परिणाम सामने आएंगे।
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