तहसीलदार को नहीं है जाति प्रमाण-पत्र जारी करने का अधिकार: हाईकोर्ट ने SDM को सक्षम अधिकारी माना

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 23, 2026, 01:58 PM IST
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने का अधिकार तहसीलदार को नहीं, बल्कि अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) यानी SDM को है। याचिकाकर्ता को 30 दिनों के भीतर नया आवेदन पेश करने की अनुमति दी गई है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने का अधिकार तहसीलदार के पास नहीं है, बल्कि यह अधिकार अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) यानी SDM के पास है। यह निर्णय न्यायमूर्ति पीपी साहू द्वारा लिया गया, जिसने एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह बात कही। याचिकाकर्ता, शैली सोनकर, ने अदालत से अनुरोध किया था कि उन्हें जाति प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश दिए जाएं।

जाति प्रमाण पत्र एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो किसी व्यक्ति की जाति को प्रमाणित करता है। यह विभिन्न सरकारी योजनाओं और लाभों के लिए आवश्यक होता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं। ऐसे प्रमाण पत्रों की आवश्यकता अक्सर शिक्षा, रोजगार, और अन्य सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए होती है।

याचिकाकर्ता ने अदालत में बताया कि उन्होंने बिलासपुर के तहसीलदार के पास जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था। तहसीलदार ने मामले को दर्ज कर प्रक्रिया शुरू की, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी उन्हें जाति प्रमाण पत्र नहीं मिला। यह स्थिति याचिकाकर्ता के लिए निराशाजनक थी, क्योंकि जाति प्रमाण पत्र न मिलने से उन्हें कई सरकारी लाभों से वंचित होना पड़ा।

राज्य सरकार ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र जारी करने का अधिकार केवल अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के पास है। सरकार ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने सक्षम अधिकारी के समक्ष आवेदन किया था। इस प्रकार, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह निर्देश दिया कि वे आवश्यक दस्तावेजों के साथ सक्षम अधिकारी के पास नया आवेदन प्रस्तुत करें।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (सामाजिक स्थिति के प्रमाणीकरण का विनियमन) अधिनियम, 2013 और राज्य सरकार के 24 सितंबर 2013 के सर्कुलर के तहत जाति प्रमाण पत्र जारी करने का अधिकार अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के पास है। यह अधिनियम जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को विनियमित करता है और सुनिश्चित करता है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत हो।

अदालत ने याचिकाकर्ता को 30 दिनों के भीतर आवश्यक दस्तावेजों के साथ सक्षम अधिकारी के पास नया आवेदन जमा करने की अनुमति दी है। यह निर्देश भी दिया गया है कि सक्षम अधिकारी को नियम और कानून के तहत आवेदन पर शीघ्र विचार करना चाहिए और निर्णय लेना चाहिए। इस निर्णय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी न हो और आवेदकों को उनके अधिकारों का सही तरीके से लाभ मिल सके।

इस मामले में हाईकोर्ट का निर्णय न केवल शैली सोनकर के लिए बल्कि अन्य लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और उचित प्रबंधन कितना आवश्यक है।

जाति प्रमाण पत्रों की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह भी आवश्यक है कि सभी संबंधित अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारियों और अधिकारों के बारे में स्पष्ट जानकारी हो। यदि अधिकारी अपनी सीमाओं के भीतर कार्य नहीं करते हैं, तो यह न केवल आवेदकों के लिए समस्याएँ उत्पन्न करता है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन में भी बाधा डालता है।

इसके अलावा, यह निर्णय यह भी संकेत करता है कि यदि किसी व्यक्ति को जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता है, तो उन्हें हमेशा सक्षम अधिकारी के पास आवेदन करना चाहिए, न कि अन्य अधिकारियों के पास। यह प्रक्रिया को सरल और अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है।

छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्रों की प्रक्रिया को लेकर कई बार विवाद उत्पन्न हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों में, विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अधिकारों की रक्षा की जाए। ऐसे में हाईकोर्ट का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम है, जो इस दिशा में एक सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

जाति प्रमाण पत्रों की आवश्यकता का सामाजिक और आर्थिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। ये प्रमाण पत्र न केवल सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आवश्यक हैं, बल्कि वे समाज में एक व्यक्ति की पहचान और स्थिति को भी दर्शाते हैं। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए, ये प्रमाण पत्र उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक कानूनी आधार प्रदान करते हैं, जिससे वे विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं।

अंततः, यह निर्णय न केवल शैली सोनकर के लिए बल्कि उन सभी के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि न्यायालयों की भूमिका न केवल कानून के अनुसार निर्णय लेने में है, बल्कि समाज में समानता और न्याय सुनिश्चित करने में भी है। इसके अलावा, यह निर्णय प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता को भी उजागर करता है, ताकि जाति प्रमाण पत्रों की प्रक्रिया अधिक सुगम और प्रभावी हो सके।

इस निर्णय के बाद, यह उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकार जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए कदम उठाएगी। इससे न केवल याचिकाकर्ता, बल्कि अन्य सभी लोग जो जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर रहे हैं, को लाभ होगा। यह एक सकारात्मक संकेत है कि न्यायालय और प्रशासन एक साथ मिलकर काम कर सकते हैं, ताकि समाज के कमजोर वर्गों को उनके अधिकार मिल सकें।

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