भारत में पहली बार हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन का शुभारंभ

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 16, 2026, 02:23 PM IST
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भारत में पहली बार हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन का संचालन शुरू होने जा रहा है, जो इसे कुछ चुनिंदा देशों में शामिल करेगा।

भारतीय रेलवे 17 जुलाई को देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल-सेल ट्रेन शुरू करने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से हाइड्रोजन से चलने वाली इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। इस पहल के साथ, भारत उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहां हाइड्रोजन फ्यूल-सेल ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है। यह कदम भारतीय रेलवे के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और यह देश की परिवहन प्रणाली में हरित ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करता है।

हाइड्रोजन ट्रेन न तो बिजली की ओवरहेड लाइन पर निर्भर होगी और न ही डीज़ल इंजन पर। इसका मतलब है कि यह ट्रेन पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होगी, क्योंकि यह प्रदूषण का स्तर कम करने में मदद करेगी। ऐसे में सवाल उठता है कि इसका इंजन कैसे काम करेगा, इसके पीछे की तकनीक क्या है और भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना की खासियत क्या है?

मई में भारतीय रेल ने उत्तर रेलवे के जींद–सोनीपत सेक्शन पर 10 कोच वाली हाइड्रोजन-संचालित ट्रेन चलाने को मंजूरी दी थी। यह ट्रेन 1200 किलोवाट क्षमता वाले हाइड्रोजन फ्यूल-सेल प्रोपल्शन सिस्टम से संचालित होगी और इसकी अधिकतम गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। जींद से सोनीपत के बीच एक तरफ की दूरी क़रीब 90 किलोमीटर है, जिसे यह ट्रेन क़रीब 2 घंटे में तय करेगी।

रेल मंत्रालय की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, यह सेवा ट्रेन संख्या 74010 और 74009 के रूप में संचालित होगी। ट्रेन संख्या 74010 सुबह 7:40 बजे जींद से रवाना होगी और 9:40 बजे सोनीपत पहुंचेगी। इसी तरह, ट्रेन संख्या 74009 10:40 बजे सोनीपत से रवाना होगी और दोपहर 1:00 बजे जींद पहुंचेगी। हाइड्रोजन फ्यूल ट्रेन जींद सिटी, पांडू पिंडारा, ललित खेड़ा, भांपेगा, ईशापुर खेड़ी, बुटाना, खांडराई, गोहाना, राबड़ा, लाठ, मोहाना और बरवासनी स्टेशनों पर रुकेगी। इस तरह यह ट्रेन दिन में दो फेरे लगाएगी और हर रोज़ कुल क़रीब 356 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली ट्रेन में एक समय में कुल 682 यात्री सफर कर सकेंगे।

यहां एक सवाल यह भी है कि क्या हाइड्रोजन फ्यूल ट्रेनों को चलाने के लिए किसी ख़ास तरह की पटरी बनाई गई है या इसके लिए कोई अलग ट्रैक होगा तो इसका जवाब है, "नहीं"। हाइड्रोजन ट्रेन सामान्य पटरियों पर ही चल सकती हैं। इसके लिए अलग ट्रैक बनाने की आवश्यकता नहीं होती। यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है, क्योंकि इससे रेलवे के मौजूदा बुनियादी ढांचे का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है।

हाइड्रोजन कैसे भरी जाएगी?

रेलवे के अनुसार, इन ट्रेनों में हाइड्रोजन भरने के लिए जींद में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र स्थापित किया गया है। यहां पानी को इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के माध्यम से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। इसके बाद तैयार हाइड्रोजन को उच्च दबाव वाले टैंकों में जमा किया जाता है और वहीं बनाए गए विशेष फ्यूलिंग साइडिंग/स्टेशन पर ट्रेन में भरा जाता है। इसके लिए सामान्य रेलवे स्टेशनों पर अलग से फ्यूल स्टेशन नहीं बनाए गए हैं। पायलट परियोजना के तहत जींद में ही यह विशेष सुविधा विकसित की गई है।

पीआईबी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) ने इस जगह पर कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए आवश्यक लाइसेंस जारी कर दिया है। रीफ्यूलिंग के लिए एक हाइड्रोजन कंप्रेशन सिस्टम उपलब्ध कराया गया है। रेल मंत्रालय के मुताबिक, हाइड्रोजन गैस भरने की प्रक्रिया को सुचारु और निर्बाध बनाए रखने के लिए एक हाइड्रोजन कंप्रेशन सिस्टम (गैस को उच्च दबाव पर कंप्रेस्ड करने वाली मशीन) लगाया गया है। इसके साथ ही आवश्यक तकनीकी सहायता और ज़रूरी स्पेयर पार्ट्स भी उपलब्ध कराए गए हैं। इसके अलावा, आपातकालीन स्थिति के लिए एक अतिरिक्त कंप्रेसर की व्यवस्था भी की जा रही है।

भारतीय रेल के अनुसार, वर्तमान में दुनिया के कुछ चुनिंदा देश-जैसे जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका-हाइड्रोजन फ्यूल-सेल ट्रेनों का संचालन कर रहे हैं या उनका परीक्षण कर रहे हैं। भारत भी अब इस ट्रेन के संचालन के साथ उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। यह कदम भारत के लिए न केवल परिवहन क्षेत्र में एक नई शुरुआत है, बल्कि यह देश की ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहल है।

हाइड्रोजन ट्रेन कैसे काम करती है?

सामान्य ट्रेनें कोयले, डीज़ल या बिजली से चलती हैं। भारतीय रेलवे के अनुसार, हाइड्रोजन ट्रेन में विशेष फ्यूल-सेल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक में हाइड्रोजन गैस की मदद से रासायनिक प्रक्रिया के जरिए बिजली उत्पन्न की जाती है, जिससे ट्रेन संचालित होती है। जहां डीज़ल इंजन काला धुआं छोड़ते हैं, वहीं हाइड्रोजन इंजन से केवल पानी की भाप निकलती है। अन्य पारंपरिक इंजनों की तुलना में हाइड्रोजन इंजन प्रदूषण नहीं फैलाता। यह विशेषता न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह यात्रियों के लिए भी एक सुखद यात्रा अनुभव सुनिश्चित करती है।

'नेशनल हाइड्रोजन मिशन' क्या है?

भारत ने फ़रवरी 2022 में 'नेशनल हाइड्रोजन मिशन' की घोषणा की थी। इसके तहत भारत को वर्ष 2030 तक हर साल 50 लाख टन 'ग्रीन हाइड्रोजन' का उत्पादन करने में सक्षम बनाना है। ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए पानी और सस्ती बिजली की आवश्यकता होती है। भारत के पास ये दोनों संसाधन उपलब्ध हैं। भारत के पास एक लंबा समुद्री तट और भरपूर मात्रा में सूर्य का प्रकाश (धूप) भी है। सौर ऊर्जा और समुद्र का पानी ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं। भारत ने एक कदम आगे बढ़ते हुए वैश्विक स्तर पर 'ग्लोबल ग्रीन हाइड्रोजन हब' बनने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है।

फरवरी 2023 में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि भारतीय रेलवे ने अपने ऐतिहासिक और पहाड़ी मार्गों पर "हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज" योजना के तहत 35 हाइड्रोजन ट्रेनों को चलाने का फ़ैसला लिया है। इसमें एक ट्रेन के निर्माण पर लगभग 80 करोड़ रुपये और रूट पर जमीनी सुविधाएं विकसित करने पर 70 करोड़ रुपये ख़र्च होने का अनुमान लगाया गया था, जो कुल मिलाकर 150 करोड़ रुपये बनता है। हालांकि, बाद में रेल मंत्रालय ने जींद–सोनीपत सेक्शन के लिए नई ट्रेन बनाने के बजाय मौजूदा डीजल ट्रेन के इंजन को बदलकर उसमें हाइड्रोजन फ्यूल-सेल तकनीक फिट कर दी। इससे इस परियोजना की लागत 150 करोड़ रुपये से घटकर 111.83 करोड़ रुपये रह गई।

111.83 करोड़ रुपये में से कुछ हिस्सा ट्रेन के अंदर नई हाइड्रोजन तकनीक लगाने पर ख़र्च हुआ। बाक़ी राशि जमीनी सुविधाओं पर खर्च की गई, जैसे जींद स्टेशन पर हाइड्रोजन गैस के भंडारण के लिए स्टोरेज टैंक और ट्रेन में गैस भरने के लिए फ्यूलिंग सिस्टम स्थापित करना। अब स्टेशन और हाइड्रोजन ट्रेन तैयार हो चुके हैं, जो 17 जुलाई से हरियाणा के जींद से सोनीपत तक अपनी दैनिक यात्रा शुरू करेगी।

हरियाणा से बीजेपी के राज्यसभा सांसद संजय भाटिया ने बीबीसी पंजाबी से बातचीत करते हुए कहा, "जींद भौगोलिक रूप से हरियाणा के बाक़ी जिलों की तुलना में बेहतर स्थिति में है।" "यहाँ शहरी आबादी के साथ-साथ ग्रामीण आबादी भी काफी अधिक है। इसलिए जींद को केंद्र में रखते हुए केंद्र सरकार ने यहाँ से हाइड्रोजन ट्रेन चलाने के बारे में विचार किया है।" इसके अलावा उन्होंने कहा कि राज्य की पिछली सरकारें जींद के लिए ऐसा कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं ला सकीं, जिससे यहाँ रोजगार के अवसर बढ़ते।

संजय भाटिया ने कहा कि जिन क्षेत्रों में अभी तक रेल यातायात के लिए बिजली की तारें नहीं बिछाई गई हैं, वहाँ डीजल की तुलना में हाइड्रोजन ट्रेन बेहतर विकल्प है। जींद भी ऐसे क्षेत्रों में से एक है। इस प्रकार, हाइड्रोजन ट्रेन न केवल पर्यावरण के लिए एक सकारात्मक कदम है, बल्कि यह क्षेत्रीय विकास और रोजगार सृजन के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहल है।

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