राजस्थान की पांच प्रसूताओं ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छामृत्यु की मांग की है, क्योंकि वे डायलिसिस पर जीवन गुजार रही हैं।
नई दिल्ली, भारत 18 जुल॰ 2026 ALN: "हमें नई ज़िंदगी दीजिए या फिर इच्छामृत्यु की अनुमति."
राजस्थान के सरकारी अस्पताल में डायलिसिस पर निर्भर पांच महिलाओं ने यह अपील की है। इन महिलाओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को एक पत्र लिखकर इच्छामृत्यु की मांग की है। उनकी स्थिति बेहद गंभीर है, और उन्होंने अपने जीवन की गुणवत्ता को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है।
महिलाओं का कहना है कि वे अस्पताल में प्रसव के लिए आई थीं, लेकिन अब उनकी ज़िंदगी डायलिसिस पर निर्भर हो गई है। धन्ली सुमन, इनमें से एक महिला, ने कहा, "डायलिसिस से हम पांच से छह महीने तक ही जिएंगे। हमें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए या हमारी किडनी ट्रांसप्लांट करवाई जाए।" यह बयान उनकी मानसिक और शारीरिक पीड़ा को दर्शाता है।
राजस्थान के विभिन्न जिलों में प्रसव के बाद महिलाओं की तबियत बिगड़ने और मौत के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हालाँकि इन महिलाओं के साथ वास्तव में क्या हुआ है, इसकी जांच की गई है, लेकिन रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा, "अगर सत्ता के अहंकार में डूबी बीजेपी सरकार ने समय रहते विपक्ष और पीड़ितों की आवाज़ सुनी होती तो आज यह शर्मनाक नौबत नहीं आती।" यह बयान राजनीतिक विमर्श को दर्शाता है, जिसमें सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह इस गंभीर मुद्दे को दबा रही है।
पिछले ढाई महीनों में राजस्थान के कोटा, बीकानेर, जोधपुर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जिलों में प्रसव के बाद महिलाओं की तबियत बिगड़ने और मौत की घटनाएं सामने आई हैं। यह घटनाएँ स्वास्थ्य प्रणाली की कमियों और महिलाओं की देखभाल में लापरवाही को उजागर करती हैं।
इसकी शुरुआत कोटा में चार से सात मई के बीच हुई, जहाँ सरकारी अस्पताल में 18 महिलाओं को प्रसव पीड़ा के बाद भर्ती किया गया था। इनमें से अधिकांश ने ऑपरेशन के माध्यम से बच्चों को जन्म दिया। कोटा के सरकारी सुपर स्पेशलिटी न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर नीलेश जैन ने पुष्टि की है कि पांच महिलाओं की मौत हो गई और अन्य पांच महिलाओं का डायलिसिस जारी है।
कोटा में जिन महिलाओं की किडनियां फ़ेल हो गई हैं, उन्हें बीते 72 दिनों से सप्ताह में दो बार डायलिसिस दिया जा रहा है। इसके बाद बीकानेर में भी इसी तरह के मामले सामने आए, जहाँ पांच महिलाओं की मौत हुई। जोधपुर में भी ऐसे ही मामले रिपोर्ट किए गए हैं, हालांकि यहाँ किसी महिला की मौत नहीं हुई।
महिलाओं ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर बताया है कि प्रसव के दौरान चिकित्सकों की लापरवाही और प्रशासन की ओर से ध्यान नहीं दिए जाने के कारण वे इच्छामृत्यु की अनुमति मांग रही हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से अंतिम प्रार्थना करते हुए लिखा है कि उनकी किडनी ट्रांसप्लांट करवाकर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और मुआवज़ा दिया जाए।
महिलाओं का यह पत्र एक गंभीर मुद्दे को उजागर करता है, जिसमें वे अपनी ज़िंदगी की गुणवत्ता को लेकर चिंतित हैं। धन्ली सुमन ने मीडिया से बातचीत में कहा, "हम डायलिसिस के भरोसे कब तक जिएंगे, ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने।"
एक अन्य महिला रागिनी ने कहा, "डायलिसिस से बेहतर तो हमें मौत दे दी जाए।" यह बयान उनके मानसिक तनाव और पीड़ा को दर्शाता है।
महिलाओं ने 13 जुलाई को डायलिसिस कराने से अस्पताल प्रशासन के सामने इनकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने 15 जुलाई को राष्ट्रपति को पत्र लिखा, तब जाकर प्रशासन ने इन महिलाओं की सुध ली।
इस बातचीत के बाद रागिनी मीणा के पति लोकेश मीणा ने कहा कि उनकी अस्पताल और ज़िला प्रशासन से बात हुई है। लिखित आश्वासन के बाद महिलाओं की डायलिसिस की गई। आश्वासन पत्र में लिखा है कि "प्रसूताओं को अस्पताल में डायलिसिस एवं अन्य चिकित्सकीय सुविधाएं पूर्ण रूप से नि:शुल्क प्रदान करने, किडनी ट्रांसप्लांट करवाने के लिए रजिस्ट्रेशन और नि:शुल्क किडनी ट्रांसप्लांट करवाया जाएगा।"
कोटा के ज़िला कलेक्टर पीयूष सामरिया ने कहा कि किडनी ट्रांसप्लांट के लिए एक मेडिकल बोर्ड होता है। यह प्रक्रिया जटिल है और इसमें कई चरण होते हैं, जिसमें मरीज की स्थिति, दाता की उपलब्धता और अन्य मेडिकल कारक शामिल होते हैं।
महिलाएं अपने नवजात बच्चों को भी नहीं देख पाई हैं। यह स्थिति न केवल उनके लिए बल्कि उनके परिवारों के लिए भी अत्यधिक कठिनाई का कारण बन रही है। पांचों महिलाएं कोटा के आम परिवारों से हैं, और उनके परिवारों को इस संकट के दौरान मानसिक और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
इन महिलाओं की स्थिति ने स्वास्थ्य प्रणाली की खामियों को उजागर किया है और यह सवाल उठाया है कि क्या सरकार इन समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त कदम उठा रही है। ऐसे मामलों में न केवल चिकित्सा की गुणवत्ता पर ध्यान देने की आवश्यकता है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंधन में सुधार किया जाए।
राजस्थान में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर कई बार सवाल उठाए गए हैं। यह घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि मौजूदा स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ न हों।
महिलाओं की इच्छामृत्यु की मांग एक गंभीर नैतिक और कानूनी मुद्दा भी है। यह सवाल उठाता है कि क्या किसी व्यक्ति को अपनी ज़िंदगी समाप्त करने का अधिकार होना चाहिए, विशेष रूप से तब जब वे गंभीर बीमारी से पीड़ित हों। इस मुद्दे पर समाज में विभिन्न दृष्टिकोण हैं, और यह चर्चा जारी रहनी चाहिए।
इस मामले में सरकार की प्रतिक्रिया और उसके द्वारा उठाए गए कदमों का इंतजार किया जा रहा है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि समाज इस मुद्दे पर संवेदनशीलता के साथ विचार करे और महिलाओं की स्थिति को समझे।
अंततः, यह घटना न केवल स्वास्थ्य प्रणाली की विफलता को दर्शाती है, बल्कि यह समाज के लिए एक चेतावनी भी है कि हमें अपने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीरता से विचार करना होगा।
इच्छामृत्यु का मुद्दा भारत में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। भारतीय कानून में इच्छामृत्यु को वैध नहीं माना गया है, लेकिन कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में "जीवन और मृत्यु का अधिकार" को मान्यता दी थी। इस निर्णय ने उन लोगों के लिए एक नई आशा जगाई थी, जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे और जिनकी जीवन गुणवत्ता बेहद खराब हो गई थी।
हालांकि, इच्छामृत्यु की अनुमति देने के लिए कई नैतिक, धार्मिक और कानूनी पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है। समाज में इस मुद्दे पर बहस जारी है और इसे एक संवेदनशील विषय माना जाता है।
राजस्थान में इस घटना ने एक बार फिर से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और प्रशासन की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए हैं। यह आवश्यक है कि राज्य सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले और महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए।
महिलाओं की इच्छामृत्यु की मांग और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे को सुनने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचा जा सके। यह न केवल एक चिकित्सा समस्या है, बल्कि यह एक सामाजिक मुद्दा भी है, जिसे समझने और हल करने की आवश्यकता है।
राजस्थान की वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएँ भविष्य में न हों। इसके लिए स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने, चिकित्सा कर्मियों की ट्रेनिंग, और मरीजों की देखभाल में सुधार की दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है।
महिलाओं की इच्छामृत्यु की मांग एक गंभीर विषय है, जो न केवल उनके जीवन पर प्रभाव डालता है, बल्कि समाज के समग्र स्वास्थ्य प्रणाली पर भी प्रभाव डालता है। इस मुद्दे पर चर्चा और संवेदनशीलता के साथ विचार करना आवश्यक है, ताकि सभी को एक सुरक्षित और स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार मिल सके।
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