डिंडौरी में साल बोरर कीट से निपटने के लिए सरकार का विशेष अभियान

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 16, 2026, 04:49 PM IST
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मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में साल बोरर कीट के प्रकोप से निपटने के लिए वन विभाग ने ग्रामीणों की मदद से विशेष अभियान शुरू किया है।

मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में साल बोरर कीट के प्रकोप से निपटने के लिए सरकार ने एक विशेष अभियान शुरू किया है। यह अभियान वन विभाग द्वारा संचालित किया जा रहा है, और इसका मुख्य उद्देश्य जंगलों को बचाना और साल (सरई) के पेड़ों को इस हानिकारक कीट से सुरक्षित करना है। साल बोरर कीट ने जिले के जंगलों में व्यापक नुकसान पहुंचाया है, जिसके चलते सरकार ने इस कीट के सिर को काटने के लिए ग्रामीणों को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया है। इस प्रक्रिया में, वन विभाग की ओर से कीड़ों के सिर के लिए 2 रुपए का भुगतान किया जा रहा है। अब तक करीब 10 लाख कीड़ों के सिर काटे जा चुके हैं, और ग्रामीणों को इसके लिए 20 लाख रुपए का भुगतान किया जाएगा।

इस अभियान का आरंभ तब हुआ जब यह स्पष्ट हो गया कि साल बोरर कीट ने जिले के जंगलों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में, भारत सरकार से अनुमति मिलने के बाद, 1 लाख 46 हजार 784 प्रभावित पेड़ों की कटाई की जाएगी। इस कटाई का उद्देश्य जंगलों में साल के पेड़ों की संख्या को बनाए रखना और इस कीट के प्रकोप को नियंत्रित करना है।

ग्रामीणों की सक्रियता

इस अभियान में स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है। एसडीओ एस.के. जाटव के अनुसार, बारिश के मौसम में हर दो हेक्टेयर क्षेत्र में साल का एक पेड़ काटा जाता है, और उसकी छाल को पीटकर छोड़ दिया जाता है। यह प्रक्रिया साल के रस की खुशबू को आकर्षित करती है, जिससे कीट वहां रस पीने के लिए पहुंचते हैं। इसके बाद, सुबह के समय ग्रामीण जंगल में पहुंचकर इन कीटों को पकड़ लेते हैं। पकड़े गए कीटों के सिरों की माला बनाकर उन्हें संग्रहण केंद्रों पर जमा किया जाता है। इसके लिए खारीडीह, चौरादादर, कबीर, जगतपुर और करंजिया में 5 संग्रहण केंद्र बनाए गए हैं।

इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह स्थानीय समुदाय को भी आर्थिक रूप से लाभान्वित कर रहा है। ग्रामीणों को कीटों के सिर का संग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे वे न केवल पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं, बल्कि आर्थिक लाभ भी प्राप्त कर रहे हैं।

साल बोरर का प्रकोप

साल बोरर कीट, जिसका वैज्ञानिक नाम हॉपलोसेरामबिक्स स्पिनिकोर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) है, विशेष रूप से साल के पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है। यह कीट पेड़ के तने में सुरंग बनाकर लार्वा और कीड़े के रूप में निवास करता है। इसकी लंबाई लगभग 2 इंच होती है और इसका जीवन चक्र लगभग एक वर्ष का होता है। इस कीट की संख्या बढ़ने पर यह पेड़ के तने के अंदर घुसकर उसे धीरे-धीरे खाता है। इसके कारण तने के नीचे बुरादे जैसा पाउडर जमा होने लगता है। यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह कीट एक पेड़ से दूसरे पेड़ में तेजी से फैल सकता है, जिससे पूरे जंगल में साल के पेड़ों की संख्या में कमी आ सकती है।

डिंडौरी जिले के पूर्व करंजिया, पश्चिम करंजिया, दक्षिण समनापुर और बजाग वन परिक्षेत्र के करीब 30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में लगे सरई (साल) के पेड़ साल बोरर कीट से प्रभावित हैं। वन विभाग ने इस क्षेत्र में कीटों को पकड़ने का अभियान 20 जून से शुरू किया है, और यह अभियान लगातार जारी है।

कटाई की तैयारी

वन विभाग की प्रोडक्शन DFO भारती ठाकरे ने बताया कि सामान्य वन मंडल ने 1 लाख 46 हजार 784 साल के पेड़ों को चिह्नित किया है, जो कीटों के प्रकोप के कारण खोखले हो गए हैं। इन पेड़ों की कटाई के लिए भारत सरकार से अनुमति का इंतजार किया जा रहा है। अनुमति मिलने के बाद, कटाई की प्रक्रिया में लगभग 3 महीने लग सकते हैं।

कटाई के बाद, वन विभाग को उम्मीद है कि करीब 46,390 क्यूबिक मीटर इमारती लकड़ी और 43,390 क्यूबिक मीटर जलाऊ लकड़ी प्राप्त होगी। इन लकड़ियों की ई-नीलामी की जाएगी, और इन्हें गाड़ा सरई और करंजिया काष्ठ गार में सुरक्षित रखा जाएगा।

अभियान का महत्व

इस अभियान का महत्व केवल जंगलों की रक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय समुदाय के लिए भी एक अवसर प्रदान करता है। वन विभाग के अनुसार, अब तक इस अभियान के तहत करीब 20 लाख रुपए का भुगतान बन चुका है, जो ग्रामीणों में वितरित किया जाएगा। पकड़े गए कीटों को जुलाई के अंत में 2 डीएफओ अधिकारियों की मौजूदगी में खत्म किया जाएगा। यह अभियान जुलाई के अंत तक चलेगा।

इस प्रकार, डिंडौरी जिले में साल बोरर कीट के खिलाफ चल रहे इस विशेष अभियान ने न केवल पर्यावरण की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, बल्कि स्थानीय समुदाय को भी आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का कार्य किया है।

बचाव के उपाय

वन विभाग के अनुसार, साल बोरर कीट के नियंत्रण के लिए संक्रमित पेड़ों की कटाई, कीड़ों को पकड़कर उनके सिर नष्ट करना और आवश्यकता पड़ने पर कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि जंगलों में साल के पेड़ों की संख्या में कमी न आए, इन उपायों को समय पर लागू करना आवश्यक है। इसके अलावा, स्थानीय समुदाय को इस अभियान में शामिल करना और उन्हें जागरूक करना भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

अंततः, इस अभियान की सफलता न केवल डिंडौरी जिले के जंगलों की स्थिति को बेहतर बनाएगी, बल्कि यह एक मॉडल के रूप में भी कार्य कर सकती है, जिसे अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।

डिंडौरी जिले की भौगोलिक स्थिति और जलवायु भी इस अभियान की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, जिसमें घने जंगल और विविध वन्यजीव शामिल हैं। साल के पेड़, जो इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं, स्थानीय लोगों के लिए भी जीवनयापन का साधन प्रदान करते हैं। साल के फल और लकड़ी का उपयोग न केवल घरेलू उपयोग के लिए किया जाता है, बल्कि यह स्थानीय उद्योगों में भी महत्वपूर्ण है।

हालांकि, साल बोरर कीट का प्रकोप इन संसाधनों को खतरे में डाल रहा है। यह कीट न केवल पेड़ों को कमजोर कर रहा है, बल्कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। यदि इस समस्या का समय पर समाधान नहीं किया गया, तो यह स्थानीय समुदाय के लिए गंभीर आर्थिक संकट का कारण बन सकता है।

इसलिए, सरकार द्वारा उठाए गए कदम न केवल पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्यक हैं, बल्कि यह स्थानीय लोगों के लिए भी एक सुरक्षा कवच का काम कर रहे हैं। अभियान के माध्यम से ग्रामीणों को शामिल करने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है, बल्कि उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति भी जागरूक किया जा रहा है।

इस अभियान की सफलता से अन्य क्षेत्रीय वन विभागों के लिए भी एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है, जहां समान समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो इसे अन्य राज्यों में भी लागू किया जा सकता है, जिससे व्यापक स्तर पर वन संसाधनों का संरक्षण किया जा सकेगा।

अंत में, डिंडौरी जिले में साल बोरर कीट के खिलाफ चल रहा यह विशेष अभियान न केवल स्थानीय समुदाय के लिए एक अवसर प्रदान कर रहा है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहल है। यह एक सामूहिक प्रयास है जिसमें सरकार, स्थानीय समुदाय और वन विभाग सभी एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

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