दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म 'सतलुज' को ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ज़ी5 से हटा दिया गया है, लेकिन पंजाब के कई गांवों में इसकी स्क्रीनिंग जारी है।
नई दिल्ली, भारत 12 जुल॰ 2026 ALN: मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फ़िल्म 'सतलुज' को अब ओटीटी प्लेटफॉर्म से दुनियाभर से हटा लिया गया है.
इसका मतलब है कि अब यह फ़िल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 पर किसी भी देश में उपलब्ध नहीं होगी. यह निर्णय फ़िल्म की सामग्री को लेकर उठे विवादों के कारण लिया गया है, जिसके चलते इसे भारत में भी हटा दिया गया।
इस मामले में बीबीसी पंजाबी की अर्शदीप अर्शी ने फ़िल्म के निर्देशक हनी त्रेहन से संपर्क किया, जिन्होंने इसकी पुष्टि की है। फ़िल्म को 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ किया गया था, लेकिन दो दिन बाद ही इसे भारत में ज़ी5 प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, सरकारी सूत्रों ने शनिवार को बताया कि दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म 'सतलुज' की सामग्री की जांच के लिए गठित समिति ने सिफारिश की है कि ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक जारी रखी जाए। समिति का मानना है कि यह फ़िल्म कथित रूप से भारत की संप्रभुता और अखंडता के ख़िलाफ़ है।
फ़िल्म का मूल नाम 'पंजाब 95' था, और इसके रिलीज़ को लेकर कई बार तारीखें बदली गईं। फ़िल्म की रिलीज़ लंबे समय से अटकी हुई थी, और इसे 7 फ़रवरी 2025 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ किए जाने की घोषणा की गई थी। हालाँकि, इसके बाद इसकी रिलीज़ एक बार फिर टाल दी गई।
फ़िल्म में दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, जगजीत संधू और गीतिका विद्या ओहल्यान ने अलग-अलग भूमिकाएं निभाई हैं। यह फ़िल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जो एक प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता थे।
ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद भी पंजाब के कई गांवों और शहरों में लोग इस फ़िल्म को डाउनलोड कर बड़ी एलईडी स्क्रीन पर देख रहे हैं। पंजाब के कई गांवों में लोग अपने स्तर पर बड़ी एलईडी स्क्रीन किराये पर लेकर गुरुद्वारों और खुले स्थानों पर एकत्र होकर इस फ़िल्म का प्रदर्शन कर रहे हैं।
पिछले कुछ दिनों में गुरदासपुर, संगरूर, जालंधर, रूपनगर (रोपड़), बठिंडा, फिरोजपुर, मोगा और पटियाला समेत कई जिलों के गांवों में फिल्म 'सतलुज' के सार्वजनिक प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। यह दर्शाता है कि फ़िल्म के प्रति लोगों में गहरी रुचि है और वे इसे देखने के लिए उत्सुक हैं, भले ही इसे आधिकारिक प्लेटफार्मों से हटा दिया गया हो।
मार्च 2025 में बीबीसी पंजाबी ने फ़िल्म के रिलीज़ न हो पाने को लेकर निर्देशक हनी त्रेहन से बातचीत की थी। हनी त्रेहन ने बीबीसी से कहा था कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफ़सी) ने शुरुआत में फ़िल्म में 21 कट लगाने को कहा था। लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, कट की संख्या 120 से भी अधिक हो गई। यह उनके लिए एक बड़ा आश्चर्य था।
त्रेहन ने कहा, "कई कट ऐसे थे, जिनका कोई कारण भी नहीं बताया गया। यह मेरी समझ से परे है।" उन्होंने यह भी कहा कि फ़िल्म जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक है और उनसे कहा गया है कि जसवंत सिंह खालड़ा का नाम ही हटा दिया जाए। "इसका मतलब तो यह हुआ कि उनका नाम लेना ही अपराध है। ऐसी सभी मांगें मंज़ूर नहीं की जा सकतीं," उन्होंने कहा।
उन्होंने कहा, "जिन लोगों को फ़िल्म से कोई आपत्ति है, मैं चाहता हूं कि वे आकर मुझसे बात करें। अगर उनकी कोई वाजिब आपत्ति होगी, तो मैं उसे स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं। मैं एक शांति प्रिय और कानून का पालन करने वाला नागरिक हूं।"
त्रेहन ने यह भी कहा कि अगर किसी को आपत्ति है, तो वह न्यायपालिका में लड़ने के लिए तैयार हैं। "लेकिन अगर आप मुझे अदालत ही नहीं जाने देंगे, तो फिर मैं क्या कर सकता हूं?" यह बयान दर्शाता है कि फ़िल्म के निर्माता अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता को लेकर कितने चिंतित हैं।
जसवंत सिंह खालड़ा का 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित उनके घर से अपहरण कर लिया गया था। इसके बाद वो कभी घर वापस नहीं लौटे। अदालती सीबीआई की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, जसवंत सिंह खालड़ा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे और शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव रह चुके थे।
सीबीआई के मुताबिक़, 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में चरपमंथ के साथ-साथ पुलिस अत्याचार, हिरासत में मौतों और कथित फ़र्ज़ी पुलिस मुठभेड़ों की घटनाओं को लेकर लगातार चर्चा में रहा। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में मिले अज्ञात शवों का ब्योरा सार्वजनिक किया था।
उनका दावा था कि ये लावारिस शव पुलिस की अवैध कार्रवाइयों के गवाह हैं। खालड़ा के इस दावे को इस तथ्य से बल मिला कि इनमें से ज़्यादातर शव पुलिस ही श्मशान घाटों तक लाई थी।
सीबीआई रिपोर्ट के मुताबिक़, जसवंत सिंह खालड़ा ने इन कथित घटनाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी। रिपोर्ट में कहा गया, "स्थानीय पुलिस को यह पसंद नहीं आया और उसने उनका अपहरण करने की साज़िश रची। इसी आपराधिक साज़िश के तहत स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने 6 सितंबर 1995 को कबीर पार्क स्थित उनके घर से खालड़ा का अपहरण कर लिया।"
रिपोर्ट के मुताबिक़, "उन्हें अवैध हिरासत में रखने के बाद उनकी हत्या कर दी गई और उनके शव को हरिके क्षेत्र की एक नहर में फेंक दिया गया।" जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी न केवल मानवाधिकारों के हनन की एक मिसाल है, बल्कि यह पंजाब में उस समय की राजनीतिक स्थिति को भी उजागर करती है।
इस फ़िल्म के माध्यम से, निर्देशक हनी त्रेहन ने खालड़ा की कहानी को एक व्यापक दर्शक वर्ग के सामने लाने का प्रयास किया है, लेकिन सरकार द्वारा फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने का निर्णय इस बात का संकेत है कि संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी और उनकी विरासत आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई है, और फ़िल्म 'सतलुज' के माध्यम से उनकी याद को जीवित रखने का प्रयास किया गया है।
इस फ़िल्म के निर्माण और इसके विवाद से यह स्पष्ट होता है कि कला और सिनेमा के माध्यम से सामाजिक मुद्दों को उठाना और उन्हें दर्शाना कितना जटिल हो सकता है, विशेषकर तब जब वे राजनीतिक और ऐतिहासिक संवेदनाओं से जुड़े होते हैं।
फ़िल्म की स्क्रीनिंग के दौरान, दर्शकों ने खालड़ा के जीवन की कहानी को सुनकर न केवल उनकी मानवाधिकारों के प्रति संघर्ष को समझा बल्कि उस समय के राजनीतिक माहौल को भी महसूस किया। यह फ़िल्म न केवल एक बायोपिक है, बल्कि यह पंजाब के इतिहास के एक महत्वपूर्ण हिस्से को भी उजागर करती है।
इस फ़िल्म की कहानी में जसवंत सिंह खालड़ा के साहस, उनके संघर्ष और उनके द्वारा किए गए प्रयासों की गहराई से पड़ताल की गई है। यह फ़िल्म उन लोगों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन सकती है जो मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं।
हालांकि, फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाना यह दर्शाता है कि समाज में अभी भी ऐसे मुद्दे हैं जिन पर खुलकर चर्चा करना संवेदनशील हो सकता है। यह स्थिति दर्शाती है कि कला और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में रचनात्मक स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना कितना आवश्यक है।
जैसे-जैसे फ़िल्म के प्रति लोगों की रुचि बढ़ रही है, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भविष्य में इसे किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर फिर से रिलीज़ किया जाएगा या नहीं। इसके अलावा, फ़िल्म के निर्माता और निर्देशक की ओर से उठाए गए सवाल और उनकी चिंताएं समाज में मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक महत्वपूर्ण बहस का हिस्सा बन सकते हैं।
इस प्रकार, 'सतलुज' फ़िल्म न केवल जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन को उजागर करती है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी देती है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन किसी भी समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।
अंततः, यह फ़िल्म दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने समाज में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए क्या कर सकते हैं और हमें किस तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ सकता है।
इस फ़िल्म के माध्यम से, जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी को एक बार फिर से जीवित किया गया है और यह दर्शाता है कि उनकी विरासत आज भी जीवित है।
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