दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' अब इंटरनेशनली भी बैन हो गई है। इसे ZEE5 से हटाने का निर्णय केंद्र सरकार के निर्देश पर लिया गया है।
नई दिल्ली, भारत 11 जुल॰ 2026 ALN: दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बैन हो गई है। यह फिल्म पहले ही भारत में ZEE5 ओवर द टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म से हटा दी गई थी, और अब इसे ZEE5 के अंतरराष्ट्रीय सेक्शन से भी हटा दिया गया है। इसकी पुष्टि फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने एक मीडिया हाउस से बातचीत में की।
इस फिल्म को भारत में 3 जुलाई को ZEE5 पर रिलीज किया गया था, लेकिन इसे 5 जुलाई को ही प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। सरकार की ओर से कहा गया था कि फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) का सर्टिफिकेट नहीं मिला था। यह एक गंभीर मुद्दा है क्योंकि भारत में फिल्मों को रिलीज करने के लिए सर्टिफिकेशन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। बिना सर्टिफिकेट के फिल्म का प्रदर्शन कानूनी रूप से अवैध है।
फिल्म के हटने के बाद विवाद बढ़ गया है। केंद्रीय राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने सोशल मीडिया पर एक विवादास्पद पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने एक आतंकवादी की फोटो साझा की, जिसमें वह हाथ में AK-47 थामे हुए है। इसके साथ ही उन्होंने एक समाचार की कटिंग भी साझा की, जिसमें गुरदासपुर जिले के बहादुरपुर गांव में 17 साल की लड़की के माता-पिता की हत्या और उसके साथ हुए बलात्कार की घटना का जिक्र किया गया है।
बिट्टू ने इस संदर्भ में कहा कि यह घटना खालिस्तान के शहीदों की एक दर्दनाक कहानी है। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग इन हत्यारों और बलात्कारियों को नायक या शहीद के रूप में पेश कर रहे हैं, वे पंजाब के लोगों के गहरे जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। यह बयान राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पंजाब के इतिहास और आतंकवाद के दौर की घटनाओं पर एक नई बहस को जन्म देता है।
फिल्म में दावा- पंजाब में फर्जी मुठभेड़ में 25 हजार मारे
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। खालड़ा ने आतंकवाद के दौर में पंजाब में फर्जी मुठभेड़ में 25 हजार युवाओं की हत्या का दावा किया था। यह फिल्म तीन साल की रोक के बाद रिलीज की गई थी, और पहले इसका नाम 'पंजाब 95' था, जिसे बाद में 'सतलुज' नाम से OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया। इस फिल्म का विषय संवेदनशील है और यह पंजाब के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना को उजागर करता है।
फिल्म हटने के बाद दिलजीत दोसांझ ने कहा कि एक इंसानियत होती है, जो अब मर गई है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस बात का दुख नहीं है कि फिल्म इंटरनेट से हटा दी गई, क्योंकि फिल्म लोगों तक पहुंच चुकी है। उनका कहना है कि एक बार जो चीज इंटरनेट पर आ गई, उसे हटाना आसान नहीं है। उन्होंने सलाहकारों की भूमिका पर भी सवाल उठाया।
दिलजीत ने उन लोगों से अपील की, जिन्होंने फिल्म को पहले ही डाउनलोड कर लिया था, कि वे इसे दूसरों के साथ शेयर करें। यह एक महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि यह दिखाता है कि डिजिटल युग में कंटेंट का वितरण और पहुंच कैसे बदल गया है। पंजाबी कलाकारों ने भी फिल्म के हटने पर गुस्सा जताया है, जो इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा केवल एक फिल्म से कहीं अधिक है, यह पंजाब की सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक स्थिति से जुड़ा हुआ है।
बिट्टू ने पोस्ट की साल 1991 की अखबार की कटिंग
केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने सोशल मीडिया पर साल 1991 की एक पुरानी अखबार की कटिंग और आतंकी शमशेर सिंह शेरा की फोटो पोस्ट की। इस पोस्ट में उन्होंने 17 वर्षीय सरबजीत कौर के साथ हुई दर्दनाक घटना का जिक्र किया। यह घटना पंजाब में आतंकवाद के दौर की एक दुखद कहानी है, जो आज भी लोगों के मन में गहरी छाप छोड़ती है।
अखबार की रिपोर्ट में क्या बताया गया
बिट्टू द्वारा साझा की गई अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 10 फरवरी 1991 को हुई थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि 'खालिस्तान कमांडो फोर्स' (KCF) से जुड़े आतंकी शमशेर सिंह शेरा और उसके साथियों ने सरबजीत कौर के माता-पिता की हत्या कर दी। इसके बाद लड़की को कथित तौर पर बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया गया। यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी थी, बल्कि यह उस समय के सामाजिक और राजनीतिक माहौल का भी एक प्रतिबिंब है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सरबजीत कौर को कई दिनों तक अलग-अलग खेतों और अज्ञात ठिकानों पर बंधक बनाकर रखा गया। इस दौरान उसके साथ बार-बार बलात्कार किया गया। बाद में पंजाब पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी की, जिसमें शमशेर शेरा को गिरफ्तार किया गया और पीड़िता को उसके कब्जे से मुक्त कराया गया। यह घटना पुलिस की कार्रवाई की प्रभावशीलता और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को भी उजागर करती है।
बिट्टू बोले- हजारों दर्दनाक किस्सों में से एक किस्सा
इस घटना का जिक्र करते हुए रवनीत बिट्टू ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह हजारों दर्दनाक किस्सों में से एक है, और यह खालिस्तान के शहीदों की कहानी है। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को यह जानना जरूरी है कि धर्म और कथित आजादी के नाम पर आतंकवाद के दौर में आम लोगों और बेटियों पर किस तरह के अत्याचार हुए थे। यह बयान पंजाब के इतिहास और वर्तमान स्थिति पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है।
कल 'कांता प्रिंसिपल बम ब्लास्ट' का वीडियो पोस्ट किया था
गौरतलब है कि इससे एक दिन पहले भी रवनीत सिंह बिट्टू ने लुधियाना के 'कांता प्रिंसिपल बम ब्लास्ट' से जुड़ी पुरानी रिपोर्ट और वीडियो साझा की थी। उनका कहना है कि आतंकवाद के दौर की इन घटनाओं को सामने लाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को उस समय की सच्चाई से अवगत कराना है। यह एक महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि यह युवा पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का प्रयास है, ताकि वे उस समय की घटनाओं से सीख सकें।
जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड पर दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' पर बैन लगने के बाद पंजाब में आतंकवाद के दौर को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है। विपक्षी पार्टियां तात्कालिक मुख्यमंत्री व केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के दादा बेअंत सिंह पर सवाल उठा रहे हैं। यह राजनीतिक विवाद पंजाब की राजनीतिक स्थिति को और जटिल बना सकता है, खासकर जब चुनाव नजदीक हों। इस प्रकार के मुद्दे राजनीतिक दलों के बीच मतभेद को और बढ़ा सकते हैं और समाज में विभाजन को भी बढ़ावा दे सकते हैं।
इस फिल्म और उसके बैन के पीछे के कारणों को समझना केवल एक फिल्म के संदर्भ में नहीं, बल्कि पंजाब के व्यापक सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है। यह मुद्दा न केवल फिल्म उद्योग के लिए, बल्कि समाज के विभिन्न हिस्सों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन जख्मों को फिर से खोल सकता है जो पंजाब के इतिहास में गहरे हैं।
पंजाब में आतंकवाद के दौर की घटनाएं, विशेष रूप से 1980 और 1990 के दशक में, राज्य के सामाजिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव डाल चुकी हैं। इस समय के दौरान, कई निर्दोष लोगों की जान गई और समाज में भय और असुरक्षा का माहौल बना। ऐसे में, दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' जैसे विषयों पर चर्चा करना न केवल आवश्यक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे कला और सिनेमा समाज में संवेदनशील मुद्दों को उजागर कर सकते हैं।
फिल्म के बैन के बाद, पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य में भी हलचल मच गई है। विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना की है, यह कहते हुए कि यह बैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। इस प्रकार के विवाद अक्सर राजनीतिक दलों के बीच तनाव को बढ़ाते हैं और समाज में विभाजन को बढ़ावा देते हैं।
दिलजीत दोसांझ और उनके समर्थकों का मानना है कि फिल्म 'सतलुज' एक महत्वपूर्ण कहानी को सामने लाने की कोशिश कर रही है, जो कि पंजाब के इतिहास का एक अनिवार्य हिस्सा है। साथ ही, यह भी दर्शाता है कि कैसे एक फिल्म के माध्यम से समाज में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
कुल मिलाकर, 'सतलुज' का बैन केवल एक फिल्म का मामला नहीं है, बल्कि यह पंजाब के इतिहास, राजनीति और समाज के जटिल ताने-बाने को उजागर करता है। यह मामले ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया है कि क्या वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित है या फिर इसे राजनीतिक हितों के लिए नियंत्रित किया जा रहा है।
इस प्रकार के मुद्दों पर चर्चा करना आवश्यक है, ताकि समाज में जागरूकता बढ़ सके और भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके। पंजाब का इतिहास और वर्तमान स्थिति दोनों ही इस बात की मांग करते हैं कि हम इन मुद्दों पर खुलकर बात करें और उन्हें समझें।
इस प्रकार, दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' का बैन न केवल फिल्म उद्योग के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण घटना है, जो हमें हमारे अतीत और वर्तमान पर विचार करने के लिए मजबूर करती है। यह समय है कि हम इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा करें और समझें कि कला और सिनेमा समाज में किस प्रकार की भूमिका निभा सकते हैं।
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