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CBSE ने 10वीं पास के लिए तीसरी भाषा में पास होना अनिवार्य किया

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 14, 2026, 12:27 PM IST
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सीबीएसई ने 2027-28 सत्र से 10वीं के छात्रों के लिए तीसरी भाषा में पास होना अनिवार्य कर दिया है। यह विषय बोर्ड परीक्षा में नहीं होगा, लेकिन स्कूल स्तर के मूल्यांकन में सफल होने पर ही छात्रों को 10वीं का पास सर्टिफिकेट मिलेगा।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने हाल ही में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत 9वीं और 10वीं कक्षा के छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है। इस बदलाव के अनुसार, अब 10वीं कक्षा का पास सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए छात्रों को तीसरी भाषा में भी पास होना अनिवार्य होगा। यह निर्णय शिक्षा के क्षेत्र में एक नई दिशा को इंगित करता है, जो बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है।

हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि तीसरी भाषा की परीक्षा बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं होगी। इसके बजाय, इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर किया जाएगा। यदि कोई छात्र इस आंतरिक मूल्यांकन में सफल नहीं होता है, तो उसे 10वीं कक्षा का पास सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा। नया नियम 2027-28 शैक्षणिक सत्र से लागू होगा, जिसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो 2026-27 में 9वीं कक्षा में प्रवेश लेंगे और 2027-28 में 10वीं कक्षा में पढ़ाई करेंगे।

बोर्ड परीक्षा में नहीं आएगा विषय, फिर भी पास होना होगा: सीबीएसई के द्वारा जारी किए गए सर्कुलर के अनुसार, तीसरी भाषा को "R3" के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस विषय की परीक्षा केवल स्कूल स्तर पर होगी। यदि कोई छात्र 10वीं कक्षा में इस आंतरिक मूल्यांकन में पास नहीं होता है, तो स्कूल को बोर्ड परीक्षा के परिणाम जारी करने से पहले दोबारा मूल्यांकन कराना होगा। यह प्रक्रिया छात्रों के लिए एक अतिरिक्त अवसर प्रदान करती है, लेकिन सीबीएसई ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि यदि कोई छात्र दोबारा मूल्यांकन में भी सफल नहीं होता है, तो उसके साथ क्या होगा।

यह स्थिति छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बन सकती है, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि असफल छात्रों के लिए क्या विकल्प उपलब्ध होंगे। इससे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि वे अपने भविष्य के प्रति अनिश्चितता का सामना कर सकते हैं।

9वीं में फेल होने पर भी मिलेगा प्रमोशन: नए नियम के अनुसार, यदि कोई छात्र 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा के मूल्यांकन में सफल नहीं होता है, तो उसे 10वीं कक्षा में जाने से नहीं रोका जाएगा। हालांकि, उसे 10वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान 9वीं की बची हुई तीसरी भाषा की परीक्षा भी पास करनी होगी। यह नियम छात्रों को एक और मौका प्रदान करता है, लेकिन यह भी अनिवार्य है कि वे 10वीं कक्षा पूरी करने से पहले इस शर्त को पूरा करें।

इस प्रावधान का उद्देश्य छात्रों को अपनी भाषाई क्षमताओं को विकसित करने का एक और अवसर देना है, जिससे वे अपनी शिक्षा में बहुभाषा का महत्व समझ सकें। यह निर्णय छात्रों के लिए एक चुनौती हो सकता है, लेकिन यह उनके भविष्य में बहुभाषी कौशल के विकास में भी सहायक हो सकता है।

6वीं से लागू होगा तीन भाषा फॉर्मूला: सीबीएसई ने इससे पहले 29 जून को भी तीन भाषा फॉर्मूला लागू करने की घोषणा की थी। इस फॉर्मूले के अनुसार, 2026-27 सत्र से 6वीं कक्षा से छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। इनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना आवश्यक है। जो छात्र पहले से अंग्रेजी के साथ कोई विदेशी भाषा पढ़ रहे हैं, वे उसे जारी रख सकेंगे, लेकिन उन्हें एक अतिरिक्त भारतीय भाषा भी पढ़नी होगी। यह कदम छात्रों को बहुभाषी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

अब तक, अधिकांश छात्र 8वीं कक्षा के बाद तीसरी भाषा छोड़ देते थे। लेकिन नए नियम के अनुसार, 2026-27 से 9वीं और 2027-28 से 10वीं में भी तीसरी भाषा पढ़ना अनिवार्य होगा। यह निर्णय भारतीय भाषाओं के प्रति छात्रों की रुचि को बढ़ाने और उन्हें सांस्कृतिक विविधता के प्रति जागरूक करने में सहायक होगा। हालांकि, 2026-27 में 10वीं बोर्ड परीक्षा देने वाले मौजूदा छात्रों पर इस नियम का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

नए नियम को अदालत में चुनौती: सीबीएसई के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई है। तीन भाषा फॉर्मूला को लेकर दायर याचिका पर फिलहाल सुनवाई चल रही है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि सीबीएसई के पुराने फैसले को बहाल किया जाए, जिसमें 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा को अनिवार्य बनाने की व्यवस्था को 2029-30 तक टाल दिया गया था। इस संदर्भ में, केंद्र सरकार ने इस नीति का बचाव किया है और कहा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के पास है।

सरकार का तर्क है कि तीन भाषा फॉर्मूला से छात्रों में बहुभाषी क्षमता बढ़ेगी, भारतीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा और सांस्कृतिक विविधता को मजबूती मिलेगी। यह दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति और भाषा की समृद्धि को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

क्यों अहम माना जा रहा है यह फैसला? सीबीएसई के इस फैसले के बाद पहली बार तीसरी भाषा को सीधे 10वीं के पास सर्टिफिकेट से जोड़ दिया गया है। भले ही इसकी परीक्षा बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं होगी, लेकिन स्कूल स्तर पर होने वाले मूल्यांकन में सफल हुए बिना छात्र को 10वीं का पास प्रमाणपत्र नहीं मिलेगा। यह कदम छात्रों को बहुभाषी शिक्षा के महत्व को समझाने और उन्हें एक समग्र शिक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक माना जा रहा है।

यह बदलाव का दीर्घकालिक प्रभाव शिक्षा प्रणाली पर पड़ेगा, क्योंकि यह छात्रों को विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के प्रति संवेदनशील बनाएगा। इसके अलावा, यह शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाएगा, जिससे छात्र बहुभाषी कौशल विकसित कर सकें और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।

इस प्रकार, सीबीएसई द्वारा लागू किया गया यह नया नियम न केवल छात्रों के लिए एक चुनौती है, बल्कि यह भारतीय शिक्षा प्रणाली में बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम भी है। इस निर्णय का प्रभाव आने वाले वर्षों में स्पष्ट होगा, जब छात्र इस नई शिक्षा प्रणाली के तहत अपनी शिक्षा पूरी करेंगे और अपने भविष्य के लिए तैयार होंगे।

इस बदलाव के पीछे एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो यह मानता है कि बहुभाषी शिक्षा न केवल छात्रों को भाषाई कौशल में सुधार करने में मदद करती है, बल्कि यह उनके मानसिक विकास, सांस्कृतिक जागरूकता और सामाजिक समावेशिता को भी बढ़ावा देती है। एक बहुभाषी शिक्षा प्रणाली छात्रों को विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और स्वीकारने में मदद करती है, जिससे वे एक समृद्ध और विविध समाज में समाहित हो सकें।

भाषा केवल संवाद का एक साधन नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, पहचान और समुदाय का एक अभिन्न हिस्सा भी है। जब छात्र विभिन्न भाषाओं का अध्ययन करते हैं, तो वे उन संस्कृतियों की भी समझ विकसित करते हैं जिनसे ये भाषाएं आती हैं। इस प्रकार, सीबीएसई का यह नया नियम न केवल छात्रों के लिए एक शैक्षणिक चुनौती है, बल्कि यह उन्हें एक समग्र और समृद्ध सामाजिक अनुभव भी प्रदान करेगा।

अंत में, यह कहा जा सकता है कि सीबीएसई के इस निर्णय का प्रभाव न केवल छात्रों के शैक्षणिक जीवन पर पड़ेगा, बल्कि यह उनके भविष्य की संभावनाओं को भी विस्तारित करेगा। बहुभाषी शिक्षा का यह नया दृष्टिकोण छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार करेगा और उन्हें एक समृद्ध और विविधता से भरे समाज में जीने के लिए सक्षम बनाएगा।

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