बिलासपुर में सरकारी प्राइमरी स्कूल के बच्चे जर्जर भवन में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। बारिश में कक्षाओं में पानी टपकता है, जिससे बच्चों को सुरक्षित स्थान पर बैठाना पड़ता है।
रायपुर, भारत 16 जुल॰ 2026 ALN: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सरकारी प्राइमरी स्कूल के बच्चे जर्जर भवन में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। बारिश शुरू होते ही कक्षाओं में पानी टपकने लगता है, जिससे बच्चों को पढ़ाने से पहले उन्हें सुरक्षित स्थान पर बैठाना पड़ता है। यह स्थिति केवल एक स्कूल की नहीं है, बल्कि पूरे जिले में शिक्षा प्रणाली की एक गंभीर समस्या को उजागर करती है।
मामला बन्नाकडीह चौक स्थित सरकारी प्राइमरी स्कूल का है। यह स्कूल 1956 से संचालित हो रहा है और इसकी इमारत में समय के साथ कई संरचनात्मक समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। स्कूल में बारिश से बचाव के लिए छत के नीचे हरा मेट लगाकर अस्थायी व्यवस्था की गई है। इसके बावजूद बारिश का पानी कक्षा के भीतर गिर रहा है, जिससे बच्चों की सुरक्षा और उनके स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
बच्चों को भीगने के साथ-साथ किसी अनहोनी का भी खतरा बना हुआ है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन इस गंभीर मुद्दे को गंभीरता से ले रहे हैं? कलेक्टर संजय अग्रवाल ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जर्जर भवनों में बच्चों की कक्षाएं नहीं लगाने के निर्देश दिए गए हैं और वैकल्पिक व्यवस्था करने को कहा गया है। यह एक सकारात्मक कदम है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? यह जानना आवश्यक है कि क्या इन निर्देशों का पालन किया जा रहा है और क्या वैकल्पिक व्यवस्थाएं वास्तव में प्रभावी हैं।
जिले में 288 जर्जर स्कूल भवन
बन्नाक चौक स्कूल की स्थिति जिले के अन्य जर्जर स्कूलों की भी तस्वीर पेश करती है। जिले में 288 जर्जर स्कूल भवन चिन्हित किए गए हैं। यह संख्या स्वयं में इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा प्रणाली में बुनियादी ढांचे की कमी कितनी गंभीर है। कुछ दिन पहले जिले के एक अन्य स्कूल में बच्चों के पेड़ के नीचे पढ़ाई करने की तस्वीर भी सामने आई थी, जो इस समस्या की गंभीरता को और बढ़ाती है। बच्चों को इस तरह की परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए मजबूर होना, न केवल उनके शैक्षणिक विकास को प्रभावित करता है, बल्कि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।
हाईकोर्ट ने मांगी थी प्रोग्रेस रिपोर्ट
पिछले साल जर्जर स्कूल भवनों से जुड़ी खबरों पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शासन और स्कूल शिक्षा सचिव से शपथ पत्र के साथ स्कूल भवनों की मरम्मत की प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे। यह आदेश इस बात का संकेत है कि न्यायालय शिक्षा के अधिकार को लेकर कितनी गंभीरता से विचार कर रहा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कलेक्टर को ही जिम्मेदारी सौंपने पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि कलेक्टर हर जगह कैसे देखेंगे, शिक्षा सचिव की भी जिम्मेदारी है। यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि शिक्षा प्रणाली में सभी स्तरों पर जिम्मेदारियों का सही तरीके से निपटारा नहीं हो रहा है।
हर साल मरम्मत का दावा
शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन हर साल बारिश से पहले जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत और नए भवनों के निर्माण का दावा करते हैं। इसके बावजूद बारिश के दौरान कई स्कूलों में बच्चों को जर्जर भवनों में पढ़ाई करनी पड़ रही है। यह स्थिति यह दर्शाती है कि या तो योजनाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है या फिर बजट की कमी के कारण आवश्यक कार्य नहीं किए जा रहे हैं। इस समस्या का समाधान करने के लिए एक ठोस योजना की आवश्यकता है, जिसमें सभी संबंधित पक्षों की सक्रिय भागीदारी हो।
कलेक्टर बोले- जर्जर स्कूल में न लगाएं क्लास
कलेक्टर संजय अग्रवाल ने कहा कि स्कूलों के रिनोवेशन का काम लगातार चल रहा है। आवश्यकता के अनुसार स्कूलों को बजट भी उपलब्ध कराया गया है। हालांकि, यह देखना होगा कि क्या यह बजट वास्तव में जर्जर भवनों की मरम्मत के लिए उपयोग किया जा रहा है और क्या आवश्यक कार्य समय पर पूरे हो रहे हैं।
इस संदर्भ में, यह आवश्यक है कि स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग एक समन्वित प्रयास करें ताकि बच्चों को सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में शिक्षा प्राप्त हो सके। जर्जर स्कूल भवनों की समस्या केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय समस्या का हिस्सा है, जो पूरे देश में शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है।
इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए, सभी संबंधित पक्षों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है ताकि बच्चों को एक सुरक्षित और समर्थित शिक्षा का वातावरण प्रदान किया जा सके। यह न केवल बच्चों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए भी आवश्यक है।
अंत में, यह स्पष्ट है कि बिलासपुर के जर्जर स्कूल भवनों की समस्या केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे की कमी की एक गंभीर समस्या का प्रतिनिधित्व करती है। इस समस्या को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि सभी बच्चों को एक सुरक्षित और प्रभावी शिक्षा मिल सके।
शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए, यह आवश्यक है कि सरकार और संबंधित संस्थाएं इस मुद्दे को प्राथमिकता दें। जर्जर भवनों की मरम्मत के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का आवंटन, उचित निगरानी तंत्र की स्थापना और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
इसके अलावा, शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए दीर्घकालिक नीतियों की आवश्यकता है। केवल तात्कालिक उपायों से समस्या का समाधान नहीं होगा। स्थायी समाधान के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें बुनियादी ढांचे के विकास, शिक्षक प्रशिक्षण और छात्र कल्याण कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
इस दिशा में, गैर सरकारी संगठनों और स्थानीय समुदायों का सहयोग भी महत्वपूर्ण हो सकता है। वे न केवल जागरूकता बढ़ा सकते हैं, बल्कि आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता में भी मदद कर सकते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए सभी हितधारकों के बीच सहयोग और संवाद आवश्यक है।
अंततः, बिलासपुर के जर्जर स्कूल भवनों की समस्या केवल एक स्थानीय चिंता नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक समस्या का हिस्सा है। यह सुनिश्चित करना कि सभी बच्चों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो, समाज की जिम्मेदारी है। इस दिशा में उठाए गए कदम न केवल बच्चों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि एक समृद्ध और शिक्षित समाज के निर्माण के लिए भी आवश्यक हैं।
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