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CBSE ने 9वीं और 10वीं के छात्रों के लिए तीसरी भाषा अनिवार्य की

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 14, 2026, 12:06 PM IST
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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने कक्षा 9 और 10 के छात्रों के लिए तीसरी भाषा को अनिवार्य विषय बना दिया है, जो 2027-28 से लागू होगा।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है, जिसके तहत कक्षा 9 और 10 के छात्रों के लिए तीसरी भाषा को अनिवार्य विषय बना दिया गया है। यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अंतर्गत लिया गया है, जिसका उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में सुधार और भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन को बढ़ावा देना है। इस नए नियम के अनुसार, छात्रों को कक्षा 10 का पास सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए तीसरी भाषा के स्कूल-स्तरीय आंतरिक मूल्यांकन को पास करना होगा।

नए बदलाव की विशेषताएँ

  • बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं, पर पास होना जरूरी:

तीसरी भाषा कक्षा 10 की मुख्य बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं होगी। इसका मतलब है कि इसके अंक मुख्य परीक्षा के परिणाम में नहीं जुड़ेंगे, लेकिन स्कूल स्तर पर इसके आंतरिक मूल्यांकन को पास करना अनिवार्य होगा। यह निर्णय छात्रों को एक अतिरिक्त भाषा सीखने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो उनकी भाषाई क्षमता और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ा सकता है।


  • कक्षा 9 में फेल होने पर मिलेगा दूसरा मौका:

अगर कोई छात्र कक्षा 9वीं में तीसरी भाषा के आंतरिक मूल्यांकन में फेल हो जाता है, तो उसे कक्षा 10 में प्रोमोट कर दिया जाएगा। हालांकि, कक्षा 10 में रहते हुए उसे कक्षा 9 के इस पेंडिंग असेसमेंट को पास करना होगा। यह प्रावधान छात्रों को एक और अवसर देता है, जिससे वे अपनी कमजोरियों पर ध्यान केंद्रित कर सकें और सुधार कर सकें।


  • कक्षा 10 में री-असेसमेंट की सुविधा:

यदि कोई छात्र कक्षा 10 के आंतरिक मूल्यांकन में फेल हो जाता है, तो स्कूलों को अंतिम बोर्ड रिजल्ट घोषित होने से पहले उस छात्र के लिए फिर से परीक्षा आयोजित करनी होगी ताकि वह इसे क्लियर कर सके। यह छात्रों को एक और अवसर प्रदान करता है, जिससे वे अपनी अकादमिक प्रदर्शन को सुधार सकें और भविष्य में बेहतर कर सकें।

कब से लागू होगा यह नियम?

यह नया नियम मुख्य रूप से अकादमिक सत्र 2026-27 में कक्षा 9 में प्रवेश करने वाले और सत्र 2027-28 में कक्षा 10 में जाने वाले छात्रों पर लागू होगा। वर्तमान में कक्षा 10 में पढ़ रहे और सत्र 2026-27 में बोर्ड परीक्षा देने वाले छात्रों पर इस नियम का कोई असर नहीं पड़ेगा। यह निर्णय उन छात्रों को प्रभावित नहीं करेगा जो पहले से ही अपनी पढ़ाई कर रहे हैं, जिससे उनके लिए कोई असुविधा नहीं होगी।

कक्षा 6 से शुरू हो चुका है थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला

सीबीएसई ने इससे पहले 29 जून को एक सर्कुलर जारी कर घोषणा की थी कि अकादमिक सत्र 2026-27 से कक्षा 6 से ही 'थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला' (तीन भाषा नीति) को लागू किया जाएगा। इस नीति के तहत छात्रों को तीन भाषाएँ पढ़नी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भाषाएँ भारतीय होनी अनिवार्य हैं। यह निर्णय भारतीय भाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह छात्रों को अपनी मातृभाषा के प्रति जागरूक करता है और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देता है।


भारतीय भाषाओं पर जोर:

इस नीति का मुख्य उद्देश्य छात्रों में बहुभाषावाद (Multilingualism) को बढ़ावा देना है। यह छात्रों को विभिन्न भारतीय भाषाओं के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेजने में मदद करेगा।


विदेशी भाषा पढ़ने वालों के लिए नियम:

जो छात्र पहले से ही अंग्रेजी के साथ किसी विदेशी भाषा को अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ रहे हैं, वे इसे जारी रख सकते हैं। हालांकि, उन्हें इसके साथ-साथ एक तीसरी भारतीय भाषा भी अनिवार्य रूप से सीखनी होगी। यह निर्णय छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के साथ-साथ उनकी भारतीय पहचान को भी सहेजने में मदद करेगा।

नीति को कोर्ट में चुनौती, केंद्र सरकार ने किया बचाव

सीबीएसई के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती भी दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि सीबीएसई अपने 9 अप्रैल के पुराने रुख को बहाल करे, जिसमें तीसरी भाषा को कक्षा 9 के लिए अनिवार्य रूप से लागू करने की योजना को साल 2029-30 तक टाल दिया गया था। इसके जवाब में, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने 13 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के तहत एक हलफनामा दायर कर नीति का दृढ़ता से बचाव किया है।


समवर्ती सूची (Concurrent List):

शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में आती है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने का पूरा अधिकार है। इस संदर्भ में, सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि यह नीति छात्रों के लिए लाभकारी है और इसे लागू करने का अधिकार उनके पास है।


सार्वजनिक और राष्ट्रीय हित:

इस थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूले का उद्देश्य छात्रों में बहुभाषावाद को बढ़ावा देना, भारतीय भाषाओं का संरक्षण करना, छात्रों के मानसिक व संज्ञानात्मक विकास को मजबूत करना और राष्ट्रीय एकता व सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देना है। यह नीति न केवल छात्रों की शैक्षणिक प्रगति में सहायक होगी, बल्कि यह उन्हें एक समृद्ध और विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में जीने के लिए भी तैयार करेगी।

सीबीएसई के इस कदम से स्पष्ट है कि बोर्ड अब भाषा शिक्षा को लेकर बेहद गंभीर है। हालांकि यह विषय मुख्य बोर्ड परीक्षा से बाहर रहेगा, लेकिन इसका पासिंग सर्टिफिकेट से जुड़ना छात्रों, स्कूलों और अभिभावकों के लिए एक बड़ा बदलाव साबित होने वाला है। यह कदम न केवल छात्रों की भाषा कौशल को बढ़ावा देगा, बल्कि उन्हें एक बहु-भाषाई समाज में सफलतापूर्वक जीने के लिए भी तैयार करेगा।

इस नीति के कार्यान्वयन के बाद, यह देखना दिलचस्प होगा कि छात्र किस प्रकार से इस बदलाव को अपनाते हैं और क्या यह वास्तव में भारतीय भाषाओं के प्रति उनकी रुचि को बढ़ाता है। इसके अलावा, यह भी महत्वपूर्ण होगा कि स्कूल और शिक्षक इस नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सही संसाधनों और प्रशिक्षण का उपयोग करें।

कुल मिलाकर, यह निर्णय भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है, जो छात्रों को भाषा की विविधता और समृद्धि के महत्व को समझने में मदद करेगा।

इसके अलावा, यह निर्णय उन छात्रों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो विभिन्न भाषाओं में संवाद करने की क्षमता विकसित करना चाहते हैं। बहुभाषावाद केवल भाषा कौशल को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि यह छात्रों के मानसिक विकास में भी सहायक होता है। शोध से पता चला है कि जो छात्र बहुभाषी होते हैं, उनकी समस्या समाधान करने की क्षमता और रचनात्मकता भी बेहतर होती है।

इस नीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह छात्रों को भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूक करने में मदद करेगी। जब छात्र विभिन्न भारतीय भाषाओं को सीखते हैं, तो वे उन भाषाओं के माध्यम से संबंधित सांस्कृतिक संदर्भों और परंपराओं से भी परिचित होते हैं। इससे न केवल उनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत होती है, बल्कि वे अन्य संस्कृतियों के प्रति भी खुला दृष्टिकोण विकसित करते हैं।

समाज में भाषा की भूमिका को समझते हुए, यह नीति न केवल छात्रों की शैक्षणिक उपलब्धियों को बढ़ावा देगी, बल्कि यह उन्हें एक समृद्ध और विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में जीने के लिए भी तैयार करेगी। इसके माध्यम से, भारतीय शिक्षा प्रणाली एक ऐसा वातावरण तैयार कर रही है, जहां युवा पीढ़ी न केवल अपनी मातृभाषा बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति भी सम्मान और जागरूकता विकसित कर सकेगी।

अंततः, यह निर्णय भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो छात्रों को बहुभाषी बनाने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेजने में मदद करेगा। यह सुनिश्चित करता है कि भविष्य की पीढ़ियाँ न केवल ज्ञान प्राप्त करें, बल्कि अपने देश की भाषाओं और संस्कृतियों की विविधता को भी समझें और सराहें।

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