ई20 ईंधन से खराब हुई कार: उपभोक्ता फोरम ने कंपनी को नई कार देने का आदेश

ALN NEWS DESK
एएलएन न्यूज डेस्क
अपडेटेड : Jul 16, 2026, 05:39 PM IST
7 min read
  • linkedin
  • twitter
  • facebook
  • instagram
  • whatsapp

रायपुर कंज्यूमर कोर्ट ने ई20 ईंधन से खराब हुई मारुति ग्रैंड विटारा के मामले में कंपनी को नया वाहन देने या 20.5 लाख रुपये रिफंड करने का आदेश दिया।

देश में ग्रीन फ्यूल के तौर पर प्रमोट किए जा रहे E20 (20% इथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को लेकर चल रही बड़ी बहस के बीच छत्तीसगढ़ से एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सामने आया है। रायपुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त पीठ) ने वाहन निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड और उसके डीलर को एक ग्राहक की ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड कार को बदलकर उसी मॉडल का नया E20-कंपैटिबल (अनुकूल) वाहन देने का कड़ा आदेश जारी किया है। उपभोक्ता आयोग ने इस मामले में कंपनी और डीलर दोनों को 'सेवा में कमी' और 'अनुचित व्यापार व्यवहार' का दोषी माना है। 14 जुलाई 2026 को आया यह ऐतिहासिक फैसला देश में इथेनॉल मिश्रित ईंधन के उपयोग और वाहन निर्माताओं द्वारा पारदर्शिता बरतने की अनिवार्यता पर एक बड़ा कानूनी संदेश देता है।

क्या है E20 ईंधन से जुड़ा यह पूरा विवाद?

यह मामला रायपुर के रहने वाले 41 वर्षीय किडनी रोग विशेषज्ञ (नेफ्रोलॉजिस्ट) डॉ. प्रेमराज देवता से जुड़ा है। डॉ. देवता ने 3 जून 2024 को मारुति सुजुकी की 'ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस' कार 18,29,000 रुपये में खरीदी थी। शिकायत के मुताबिक, कार खरीदने के समय उन्हें यह बिल्कुल नहीं बताया गया था कि यह गाड़ी व्यापक रूप से उपलब्ध E20 इथेनॉल-मिश्रित ईंधन के पूर्ण अनुकूल नहीं है। बाद में पता चला कि जो गाड़ी उन्हें नई बताकर जून 2024 में बेची गई थी, वह वास्तव में जनवरी 2023 में निर्मित की गई थी- यानी बिक्री से लगभग 17 महीने पहले।

कार करीब 21,913 किलोमीटर तक बिना किसी परेशानी के चली, लेकिन नवंबर 2024 में इसके डैशबोर्ड पर अचानक इंजन की खराबी का सिग्नल आ गया। इसके बाद बार-बार डीलर के वर्कशॉप जाने, फ्यूल टैंक साफ कराने और स्पेयर पार्ट्स बदलने के बाद भी कार लगातार खराब होती रही। थक-हारकर ग्राहक ने कंपनी और रायपुर के नेक्सा मैग्नेटो (स्काई ऑटो मोबाइल) डीलर के खिलाफ आयोग का दरवाजा खटखटाया। इस बीच, मार्च 2025 से ग्राहक को एक वैकल्पिक कार (लोनर वाहन) दी गई थी, जबकि उनकी अपनी गाड़ी डीलरशिप पर ही खड़ी रही।

मारुति सुजुकी और डीलर ने बचाव में क्या तर्क दिए?

फोरम के समक्ष मारुति सुजुकी और डीलर ने शिकायत का कड़ा विरोध किया। उनके वकीलों ने दलील दी कि गाड़ी के इंजन में आई खराबी किसी मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (निर्माण संबंधी कमी) के कारण नहीं थी, बल्कि इसमें मिलावटी या प्रदूषित ईंधन के इस्तेमाल से हुई थी। कंपनी ने अपनी बात साबित करने के लिए लैब टेस्ट रिपोर्ट भी दाखिल की, जिसमें कार से निकाले गए ईंधन की गुणवत्ता को खराब बताया गया था। उनका कहना था कि ईंधन की गुणवत्ता एक बाहरी कारक है और यह गाड़ी की वारंटी शर्तों के तहत कवर नहीं होता है।

कंज्यूमर फोरम ने कंपनी और डीलर को क्यों दोषी ठहराया?

अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्य डॉ. आनंद वर्गीस की पीठ ने कंपनी के दावों को खारिज करते हुए आंशिक रूप से शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने स्पष्ट किया कि जनवरी 2023 में निर्मित यह गाड़ी E20 ईंधन के अनुकूल नहीं थी। इसके बावजूद, कंपनी और डीलर ने ग्राहक को यह महत्वपूर्ण जानकारी छुपाकर 17 महीने बाद गाड़ी बेच दी। ऐसे में बार-बार ईंधन टैंक साफ करने से इस तकनीकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता था। आयोग ने इसे उपभोक्ता के अधिकारों का हनन और सेवा में गंभीर लापरवाही करार दिया।

मुआवजे और वित्तीय भुगतान से जुड़े क्या निर्देश दिए गए हैं?

उपभोक्ता आयोग ने मारुति सुजुकी और डीलरशिप को आदेश जारी होने के 45 दिनों के भीतर निम्नलिखित निर्देश पूरे करने को कहा है:

  • नया वाहन देना: ग्राहक को उसी मॉडल की नई E20-कंपैटिबल ग्रैंड विटारा कार दी जाए।
  • कार न बदलने की स्थिति में रिफंड: यदि 45 दिनों में कार नहीं बदली जाती है, तो विरोधी पक्षों को कुल 20,50,494 रुपये का पूरा भुगतान करना होगा। इस राशि का ब्योरा इस प्रकार है:
  • वाहन की मूल कीमत: 18,29,000 रुपये
  • आरटीओ शुल्क: 1,86,850 रुपये
  • बीमा प्रीमियम: 34,644 रुपये
  • मानसिक प्रताड़ना व कानूनी खर्च: गाड़ी बदलने या न बदलने, दोनों ही स्थितियों में ग्राहक को मानसिक प्रताड़ना के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा और मुकदमा खर्च के लिए 10,000 रुपये का भुगतान करना होगा।
  • ब्याज की शर्त: यदि निर्धारित 45 दिनों के भीतर इस राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो विरोधी पक्षों को आदेश की तिथि से भुगतान के दिन तक इस पर 7% वार्षिक दर से ब्याज चुकाना होगा।

यह फैसला देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और वाहन कंपैटिबिलिटी को लेकर चल रहे विमर्श को एक नया मोड़ देने वाला साबित होगा।

ई20 ईंधन को लेकर भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई पहल की हैं। यह इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का एक नया मानक है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण को बेहतर बनाना और पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता को कम करना है। यह कदम न केवल ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह किसानों के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि इथेनॉल का उत्पादन मुख्यतः गन्ने और अन्य फसलों से किया जाता है।

हालांकि, इस प्रकार के ईंधन के उपयोग में कई चुनौतियाँ भी हैं। उपभोक्ताओं को ई20 ईंधन के अनुकूल वाहनों की जानकारी की कमी, और वाहन निर्माताओं द्वारा इस संबंध में पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याएँ सामने आई हैं। इस मामले में उपभोक्ता आयोग का फैसला इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जो उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने और वाहन निर्माताओं को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग करने का काम करेगा।

इस फैसले के बाद, यह उम्मीद की जा रही है कि अन्य वाहन निर्माताओं को भी अपने उत्पादों की ईंधन संगतता के बारे में अधिक स्पष्टता प्रदान करनी चाहिए। इससे उपभोक्ताओं को सही जानकारी मिलेगी और वे सही निर्णय ले सकेंगे। इसके अलावा, इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता अदालतें इस तरह के मामलों में गंभीरता से कार्रवाई करने के लिए तत्पर हैं, जिससे उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।

इस मामले के माध्यम से यह भी स्पष्ट हुआ है कि तकनीकी समस्या के लिए उपभोक्ताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है, जब कि निर्माता को अपने उत्पादों की गुणवत्ता और उपयुक्तता के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। उपभोक्ताओं को यह अधिकार है कि वे जानें कि वे जो उत्पाद खरीद रहे हैं, वह उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप है या नहीं।

अंततः, यह फैसला न केवल डॉ. देवता के लिए बल्कि सभी उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण जीत है। यह एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करता है जहां उपभोक्ता अपने अधिकारों के लिए खड़े हुए और न्याय प्राप्त किया। यह उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उपभोक्ताओं की सुरक्षा को और मजबूत करेगा।

इस निर्णय का व्यापक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। यदि अन्य उपभोक्ता भी इस तरह की समस्याओं का सामना करते हैं, तो वे भी इस फैसले का आधार लेकर अपनी शिकायतें दर्ज कर सकते हैं। इससे उपभोक्ता अदालतों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है, जो कि वाहन निर्माताओं के लिए एक चेतावनी के रूप में काम कर सकती है।

इस प्रकार, ई20 ईंधन और उससे जुड़े मामलों में उपभोक्ता आयोग का यह निर्णय न केवल एक कानूनी जीत है, बल्कि यह उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम भी है। यह सुनिश्चित करेगा कि वाहन निर्माताओं को अपने उत्पादों की गुणवत्ता और उपयुक्तता के बारे में अधिक जिम्मेदार बनाया जाए, और उपभोक्ताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराई जाए।

Get More Updates

To learn more about the latest developments in Financial Literacy, stay updated with our exclusive reports and analyses on AiLensNews.

Related News